प्रतिवेदन
श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान द्वारा दिनांक १७-२३ अगस्त २०२६ को सायंकाल ५-७ बजे
तक अन्तर्जालीय माध्यम से राष्ट्रीय कार्यशाला का समायोजन किया गया। पण्डित मधुसूदन ओझा प्रणीत
प्रत्यन्तप्रस्थानमीमांसा नामक ग्रन्थ को आधार बना कर यह सप्तदिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला संपन्न हुई। यह
ग्रन्थ भारतीय ज्ञानपरम्परा की एक अद्भुत निधि है। इसमें समुद्रयात्रा की प्रासंगिकता पर विचार किया गया
है। किस प्रकार शास्त्रार्थ की परम्पारा को ग्रन्थ के रूप निबद्ध किया गया है। सात दिनों तक आमन्त्रित विद्वानों
के द्वारा इस महनीय विषय पर चर्चा होती रही।
प्रथम दिवस प्रो. मीरा द्विवेदी, आचार्य, संस्कृत विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली ने अपने निर्धारित ग्रन्थ
पर व्याख्यान प्रस्तुत करती हुई कही कि प्राचीन समय में यदि कोई समुद्रयात्रा करता था तो उसे तीन प्रकार के
पाप का भागी बनना पड़ता था। समुद्रयात्रा के कारण पाप, दूरदेश जाने से पाप एवं दूर देश के लोगों से संपर्क के
कारण पाप । पहले जमान में दूर यात्रा का निषेध इसलिए था कि कोई व्यक्ति अपने आचारण का ठीक ठीक
पालन दूसरे देश में नहीं कर सकता था। विचार का यही मुख्य विषय है।
डॉ. धनञ्जय वासुदेव द्विवेदी, अध्यक्ष, संस्कृत विभाग, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय, राँची ने कहा
कि शास्त्र में कहा गया है कि जो कोई व्यक्ति अङ्गदेश, बङ्गदेश और कलिङ्गदेश जाता है उसका संस्कार अर्थात् शुद्धि
करनी चाहिए। किस सन्दर्भ में इस वचन को प्रमाण के लिए प्रस्तुत किया गया है। इस वचन के आधार पर सभी
व्यक्तियों का संस्कार होगा अथवा नहीं। समुद्रयात्रा के सन्दर्भ में इस विषय पर विशद चर्चा इस ग्रन्थ में की गयी है।
द्वितीय दिवस प्रो. सत्यप्रकाश दुबे, पूर्व कलासंकाय प्रमुख तथा पूर्व संस्कृतविभागाध्यक्ष, जय नारायण व्यास
विश्वविद्यालय, जोधपुर ने कहा कि छः प्राकर से समुद्रयात्रा हो सकती है। ये हैं- प्रायश्चित्त के लिए समुद्रयात्रा, तीर्थयात्रा
के लिए समुद्रयात्रा, शिक्षा-समर-वाणिज्य-व्यवसाय आदि के लिए समुद्रयात्रा, राजा के आदेश से समुद्रयात्रा, जीविका के
लिए समुद्रयात्रा, चित्तविनोद के लिए समुद्रयात्रा।
डॉ. यदुवीर स्वरूप शास्त्री, सहायक आचार्य, व्याकरण विभाग, कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय
दरभंगा ने कहा कि युग के अनुसार समुद्रयात्रा की प्रशस्ति और निन्दा पर विचार किया गया है। द्वापर युग में भी
समुद्रयात्रा हुई थी। इसके लिए पुराण के वचन उद्धृत किये गये हैं। ताम्रलिप्त देश का राजा, कर्वाट देश का राजा, सुह्यदेश का राजा ने समुद्रयात्रा की थी। कलियुग में भी महाकवि कालिदास सिंहलद्विप के कुमारदास नामक राजा के यहाँ गये
थे। रत्नावली नाटिका में भी यौगन्धरायण नामक मन्त्री समुद्रयात्रा की थी। इन लोगों ने कोई प्रायश्चित्त भी नहीं किया था।
तृतीय दिवस प्रो. राजधर मिश्र, आचार्य, व्याकरण विभाग, जगद्गुरु रामानन्दाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय,
जयपुर ने कहा कि छः प्रकार की समुद्रयात्रा का उल्लेख है। उसमें तीर्थ के लिए जो समुद्रयात्रा है। उसके विषय में कहा गया
है कि द्वारका नगर में भगवान् श्रीकृष्ण के दर्शन के लिए समुद्रयात्रा होती है। यह समुद्रयात्रा सर्वथा विहित और प्रशस्त भी
है । फिर कैसे समुद्रयात्रा अनुचित है, यह विचार विद्वानों को करना चाहिए।
प्रो. हरीश, आचार्या, संस्कृत विभाग, किरोड़ी मल महाविद्यालय, नई दिल्ली ने कही कि कलिवर्ज्यप्रसङ्ग में सभी
जगहों पर एकरूप से समुद्रयात्रा निद्धिध नहीं देखा जाता है। कलिवर्ज्यप्रसङ्ग में भी किसी स्थान पर सामान्यदृष्टि से
विचार किया गया है, किसी स्थान पर विशेष दृष्टि से निषेध किया गया है। इन दोनों सन्दर्भों के कारण सन्देह होता है।
जिस पर विचार करना आवश्यक है।
चतुर्थ दिवस प्रो. धर्मदत्त चतुर्वेदी, आचार्य, संस्कृत विभाग, शब्दविद्या संकाय, केन्द्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान
मानित विश्वविद्यालय, वाराणसी ने ग्रन्थ को पढ़ाते हुए कहा कि पुराण में एक प्रमाणभूत वचन मिलता है। उसी की चर्चा
हो रही है। जो पुराण का यह वचन है वह वचन उपपुराण में भी है।। पुराणा की अपेक्षा से उपपुराण की प्रमाणिकता नहीं हो
सकती है, इस दृष्टि से यहाँ विचार चल रहा है।
डॉ. आयुष गुप्ता, सहायक आचार्य, वैदिक अध्ययन विभाग, डॉ. हरी सिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय, सागर ने
विषय को उद्घाटित करते हुए कहा कि ‘समुद्रयायी’ शब्द का प्रयोग हुआ है। इस शब्द का क्या अर्थ हो सकता है एवं
‘समुद्रग’ इस शब्द का क्या अर्थ हो सकता है। ‘णिनिः’ प्रत्यय स्वभाव के अर्थ में है। जिसका स्वभाव है समुद्रयात्रा
करना, वह समुद्रयायी कहलाता है। व्याकरण की प्रकृति और प्रत्यय के आधार पर समुद्रयात्रा का विचार किया गया है।
पञ्चम दिवस प्रो. पञ्कज कुमार व्यास, आचार्य एवं अध्यक्ष, व्याकरण विभाग, राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, तिरुपति
ने कहा कि जिसने समुद्रयात्रा की है। कलियुग में उस व्यक्ति के श्राद्ध का निषेध है। उस श्राद्ध में यदि कोई व्यक्ति
भोजन करता है, वह कदापि दोष का भागी नहीं होता है।
प्रो. सुमन कुमार झा, आचार्य एवं अध्यक्ष, साहित्य विभाग, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत
विश्वविद्यालय, नई दिल्ली ने कहा कि दुर्जनन्याय को आधार बना कर आगे की व्याख्या की गई है। जिस प्रकार लोक में
दुर्जन का पक्ष पहले मान लिया जाता है। उसी प्रकार शास्त्र में भी कुछ देर के लिए पूर्वपक्ष के सिद्धान्त को स्वीकार कर
के सिद्धान्ती अपना पक्ष रखता है। ग्रन्थ के इस प्रसंग में मनुमरीचि के वचन को पूर्वपक्षी स्वीकार करता है। उस वचन को
सिद्धान्ती आधार बना कर विचार प्रस्तुत करता है। मनु के वचन से श्राद्ध में समुद्रयात्रा की कलिवर्ज्यता है, अन्य स्थानों
पर नहीं है, यही सिद्धान्तपक्ष है।
षष्ठ दिवस प्रो. मैत्रीयी कुमारी, आचार्या, संस्कृत विभाग, कमला नेहरू महाविद्यालय, नई दिल्ली ने कही कि यदि कोई
व्यक्ति समुद्रयात्रा करता है तो उसके लिए तीन वर्षों का प्रायश्चित्त का विधान है। कहीं पर संस्कार करने का भी विचार है।
शास्त्र में एक जगह समुद्रयात्रा समुचित है तो दूसरी जगह समुद्रयात्रा निषिद्ध है। यही ग्रन्थ का अभिप्राय है।
डॉ. ठाकुर शिवलोचन शाण्डिल्य, सहायक आचार्य, संस्कृत विभाग, कला संकाय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय,
वाराणसी ने कहा कि किसी देश में एक साथ भोजन करने का विधान है, पत्नी के साथ भोजन करने का विधान है, वासी
भोजन का विधान है, ममेरी बहन के साथ विवाह का विधान है, बुआ के बेटी से शादी का विधान है, ये पाँच व्यवहार
दक्षिण के देश में मान्य हैं परन्तु उत्तर देश में मान्य नहीं है। इसी प्रकार के तर्क पर समुद्रयात्रा का विचार किया गया है।
सप्तम दिवस प्रो. अनिल प्रताप गिरि, आचार्य एवं अध्यक्ष, संस्कृत विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज ने कहा
कि ‘कलियुग में सामान्यतया बौद्धिक वर्गों के लिए समुद्रयात्रा वर्जित है’ यह प्रतिज्ञावाक्य है। ग्रन्थ के इस प्रकरण में
उत्तर भारतीय और दक्षिण भारतीय के भेद से व्यवस्था का प्रतिपादन ग्रन्थकार ने किया है।
डॉ. एन् वैति सुब्रह्मणियन्, सहायक आचार्य, संस्कृत पालि एवं प्राकृतविभाग, हिमाचल प्रदेश केन्द्रीय
विश्वविद्यालय, धर्मशाला ने कहा कि नारद के वचन में और पराशर के वचन में कलियुग में समुद्रयात्रा निषिद्ध है। परन्तु
वौधायन के वचन से एवं व्यास के वचन से समुद्रयात्रा समर्थित है। इन दोनों के वचनों में सामञ्जस्य स्थापित करना
आवश्यक है। ग्रन्थकार ने बड़े परिश्रम से पौर्वापर्य विषय को समालोचना कर के समुद्रयात्रा विहित है, ऐसा प्रतिपादन किया
है।
प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल, आचार्य, संस्कृत एवं प्राच्य विद्या अध्ययन संस्थान, जवाहरलाल नेहरू
विश्वविद्यालय, नई दिल्ली ने सप्तदिवसीय राष्ट्रिय कार्यशाला के अध्यक्ष थे । उन्होंने कहा सभी विद्वानों का
व्याख्यान सुस्पष्ट और सारगर्भित था। उन्होंने कहा कि यह प्रत्यन्तप्रस्थानमीमांसा नामक ग्रन्थ हमलोगों के लिए
ज्ञाननिधि है। आधुनिक समय में समुद्रयात्रा उचित है अथवा अनुचित यह विषय नहीं है। अपितु ग्रन्थकार ने
जिस शैली से ग्रन्थ को पूर्वपक्ष एवं उत्तरपक्ष के रूप में प्रस्तुत किया है, वह अवलोकनीय है।
डॉ. दुर्गाशरण रथ, सहायक आचार्य, वेदविभाग, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, श्रीरघुनाथकीर्ति
परिसर ने सस्वर वैदिक मङ्गलाचरण का पाठ किया। कार्यक्रम का सञ्चालन श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध
संस्थान के शोध अधिकारी डॉ. लक्ष्मी कान्त विमल ने किया। इस सप्तदिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला में अनेक
प्रान्तों के विश्वविद्याल और महाविद्याल के आचार्य, शोधछात्र, संस्कृत विद्या मे रुचि रखने वाले विद्वानों ने
उत्साह पूर्वक भाग ग्रहण कर कार्यशाला को सफल बनाया। इस कार्यशाला के सातों दिवसों में लगभग २००
विद्वानों ने भाग ग्रहण किया।