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Brahma's Universe- The Chronicle of Creation

Brahma’s Universe- The Chronicle of Creation

The Brahma’s Universe: The Chronicle of Creation is the English translation of Jagadguruvaibhavam prepared by a board of editors at Shri Shankar Shikshayatan headed by well-known indologist, Prof. Kapil Kapoor.  Renowned Vedic scholar, Pandit Madhusudan Ojha has presented in this volume a rich and ancient history of our world and civilisation. Jagadguruvaibhavam, the final part of the trilogy authored by Ojhaji on various facets of Creation, is as much an insightful work on the Vedic knowledge contained in the Vedas and Puranas as also an exceptional example of his profound knowledge and wisdom. Indravijayaha (Bharatavarsa: The India Narrative in English) and Devasurkhyati are the first two volumes on the subject. The Brahma’s Universe: The Chronicle of Creation is the English translation of Jagadguruvaibhavam prepared by a board of editors at Shri Shankar Shikshayatan headed by well-known indologist, Prof. Kapil Kapoor. Brahma is the central character of this book and through his forms, age and abode, Ojhaji has outlined the story of our universe’s evolution. It was Brahma who perceived that, in this world, the source of energy is the surya or sun. All spiritual, metaphysical and supraphysical energies are existent in the surya. The vital energy or prana , which gives life to all beings, too is produced from the sun. Brahma recorded all these in granthas (volumes) that came to be known as the Vedas. Written in verse form, the volume offers a unique rendering of the creation of atma, veda, praja and dharma. Ojhaji presents a remarkable insight into the ancient knowledge on rivers, mountains, eras and communities like Sadhyas and Manijas. Brahma’s Universe is more than a companion book of Bharatavarsa-The India Narrative. It expands the magnificent narrative of Creation, offers broader meaning to Vedic terms and illuminates the profound wisdom contained in the Vedas. प्रसिद्ध वैदिक विद्वान, पंडित मधुसूदन ओझा ने इस खंड में हमारी दुनिया और सभ्यता का एक समृद्ध और प्राचीन इतिहास प्रस्तुत किया है । सृष्टि के विभिन्न पहलुओं पर ओझा जी द्वारा लिखित त्रयी का अंतिम भाग जगद्गुरुविभवम, वेदों और पुराणों में निहित वैदिक ज्ञान पर एक व्यावहारिक कार्य है और साथ ही उनके गहन ज्ञान और ज्ञान का एक असाधारण उदाहरण भी है । इंद्रविजय (भारतवर्ष: अंग्रेजी में भारत कथा) और देवसुरख्यति इस विषय पर पहले दो खंड हैं । ब्रह्मा का ब्रह्मांड: द क्रॉनिकल ऑफ क्रिएशन प्रसिद्ध इंडोलॉजिस्ट, प्रो कपिल कपूर की अध्यक्षता में श्री शंकर शिक्षायतन में संपादकों के एक बोर्ड द्वारा तैयार जगद्गुरुवैभवम का अंग्रेजी अनुवाद है । ब्रह्मा इस पुस्तक का केंद्रीय चरित्र है और अपने रूपों, आयु और निवास के माध्यम से, ओझा ने हमारे ब्रह्मांड के विकास की कहानी को रेखांकित किया है । यह ब्रह्मा था जिसने माना था कि, इस दुनिया में, ऊर्जा का स्रोत सूर्य या सूर्य है । सूर्य में सभी आध्यात्मिक, आध्यात्मिक और अतिभौतिक ऊर्जाएं मौजूद हैं । प्राण ऊर्जा या प्राण , जो सभी प्राणियों को जीवन देती है, भी सूर्य से उत्पन्न होती है । ब्रह्मा ने इन सभी को ग्रंथों (संस्करणों) में दर्ज किया, जिन्हें वेदों के रूप में जाना जाने लगा । पद्य रूप में लिखा गया, खंड आत्मा, वेद, प्रजा और धर्म की रचना का एक अनूठा प्रतिपादन प्रदान करता है । ओझा जी नदियों, पहाड़ों, युगों और समुदायों जैसे साधुओं और मनीजों पर प्राचीन ज्ञान में एक उल्लेखनीय अंतर्दृष्टि प्रस्तुत करते हैं । ब्रह्मा का ब्रह्मांड भारतवर्ष की एक साथी पुस्तक-द इंडिया नैरेटिव से अधिक है । यह सृष्टि की शानदार कथा का विस्तार करता है, वैदिक शब्दों को व्यापक अर्थ प्रदान करता है और वेदों में निहित गहन ज्ञान को प्रकाशित करता है ।

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राष्ट्रीय संगोष्ठी : शारीरकविमर्श

प्रतिवेदन श्रीशंकर शंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान द्वारा दिनांक ३१ अक्टूबर २०२३ को शारीरकविमर्श नामक राष्ट्रीय संगोष्ठी का समायोजन अन्तर्जालीय माध्यम से किया गया। यह संगोष्ठी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के संस्कृत एवं प्राच्यविद्या अध्ययन संस्थान के आचार्य एवं श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान के समन्वयक प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल की अध्यक्षता में सम्पन्न हुयी जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में प्रो. भगवत् शरण शुक्ल, पूर्वविभागाध्यक्ष, व्याकरण विभाग, संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी, मुख्य वक्ता के रूप में प्रो. टी. वी. राघवाचार्युलु, आचार्य, आगम विभाग,  राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, तिरुपति तथा दो अन्य वक्ता के रूप में डॉ. राजीव लोचन शर्मा, विभागाध्यक्ष, न्याय विभाग, कुमार भास्कर वर्मा संस्कृत पुरातन अध्ययन विश्वविद्यालय, असम से एवं डॉ. रघु बी. राज्, सहायक आचार्य, अद्वैतवेदान्त विभाग, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, वेदव्यास परिसर, हिमाचल प्रदेश ने सहभागिता करते हुए निर्धारित विषय पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत किये। पण्डित मधुसूदन ओझा विरचित शारीरकविमर्श ग्रन्थ के १४ वें प्रकरण को आधार बना कर यह राष्ट्रीय संगोष्ठी सुसंपन्न हुई। १४ वें प्रकरण का विषयवस्तु ग्रन्थकार ने इस प्रकार प्रस्तुत किया है- अनेक दार्शनिकों ने अपने सिद्धान्त के अनुसार प्रधान तत्त्व को निर्धारित करते हुए सृष्टि की व्याख्या की है। चार्वाकों ने लोक को, शैवदार्शनिकों ने शिव को, भागवतों ने प्रकृति सहित विष्णु को, वैशेषिक दार्शनिकों ने प्रजापति स्वरूप आत्मा को, सांख्य दार्शनिकों ने पुरुष को और वेदान्तियों ने ब्रह्म तत्त्व को सृष्टि का मूलकारण स्वीकार किया है-             ‘लौकायतिका लोकं शैवाः शिवमिच्छयैव विश्वसृजम् ।           भागवताः सप्रकृतिं विष्णुं पश्यन्ति विश्वकर्तारम् ॥           वैशेषिकाः प्रजापतिमात्मानं पूरुषं सांख्यः ।           अथ वेदान्ती पश्यति ब्रह्मैवात्मानमस्य विश्वस्य ॥           तद्ब्रह्मणः स्वरूपं विज्ञातुं प्रयतमनानेन ।           मीमांसासूत्राणां तात्पर्यं भूयसाऽलोच्यम् ॥’, शारीरकविमर्श, पृ.२५४ इस प्रकरण में १० उपशीर्षकों के माध्यम से आत्मतत्त्व पर विचार किया गया है। जिसका संक्षिप्त विवरण अधोलिखित है- (क)चार्वाकदर्शन में लोक को आत्मा स्वीकार किया गया है। लोक को विश्वप्रजापति कहा गया है। यह आत्मातीत है। यह चार्वाक दर्शन नास्तिक कहलाता है। (ख) शैवदर्शन में विराट् प्रजापति आत्मा है। उपासक की दृष्टि से यह ईश्वर है। इस आत्मा की उपासना उपासक करते हैं। (ग) वैष्णव भागवत दर्शन वाले विराट् प्रजापति को ही आत्मतत्त्व मानते हैं। यह विष्णु प्रकृति में स्थित रहता है। (घ) वैशेषिक सत्यप्रजापति को आत्मतत्त्व मानते हैं। (ङ) सांख्यदर्शन वाले कपिल यज्ञप्रजापति को आत्मतत्त्व मान्ते हैं। इस दर्शन में पुरुष और प्रकृति साथ साथ सृष्टि करते हैं। (च) वेदान्तदर्शन निर्विशेष परात्पर को आत्मतत्त्व मानते हैं। अपने उद्बोधन में प्रो. भगवत् शरण शुक्ल ने कहा कि शारीरकविमर्श के १४ वें प्रकरण में ईश्वर तत्त्व पर ही विचार किया गया है। न्यायकुसुमञ्जलि के आलोक में उन्होंने कहा कि सभी दार्शनिकों ने इस ईश्वर को भिन्न-भिन्न रूप में प्रस्तुत करते हुए भी एक ही तत्त्व की व्याख्या की है। प्रो. टी. वी. राघवाचार्युलु ने कहा कि निर्विशेष उपनिषद् दर्शन का चिन्तन है। दर्शन की भाषा में इसे शुद्धचैतन्य कहा जा सकता है। डॉ. राजीव लोचन शर्मा ने इस प्रकरण का अक्षरशः व्याख्या करते हुए कहा कि इसमें सांख्यदर्शन के प्रधान तत्त्व पुरुष पर विशेष विचार किया गया है।  जो पुर् अर्थात् शरीर पिण्ड  में निवास करता है, वह पुरुष कहलाता है। वही पुरुष महेश्वर, ईश्वर और जीव है। डॉ. रघु बी. राज् ने कहा कि जिस  तत्त्व का कोई विशेषण न हो वह तत्त्व निर्विशेष है। इसी विषय का वेदान्त में शुद्धचैतन्य, ईश्वरचैतन्य और जीव चैतन्य के नाम से भी वर्णन किया गया है। अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल ने कहा कि सभी दार्शनिकों ने आत्मा को स्वीकार किया है। परन्तु इस आत्मा के स्वरूप में मतभिन्नता प्रतिपादित की गयी। पं. ओझाजी ने सभी दार्शनिकों का विचार यहाँ प्रस्तुत किया है। ग्रन्थ के अन्त में इसका संकेत प्राप्त होता है। आत्मा की पाँच संस्थाओं के आधार पर दृष्टिकोण की भिन्नता है । वस्तुतः आत्मतत्त्व एक है। संगोष्ठी का प्रारंभ वैदिक मंगलाचरण से तथा समापन वैदिक शान्तिपाठ से हुआ। कार्यक्रम का सञ्चालन श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान के शोध अधिकारी डॉ. लक्ष्मीकान्त विमल ने तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. मणि शंकर द्विवेदी ने किया। देश के विविध विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों एवं अन्य शैक्षणिक संस्थानों के आचार्यों एवं शोधछात्रों ने अपनी सहभागिता द्वारा इस संगोष्ठी को सफल बनाया।       

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पण्डित मधुसूदन ओझा का वैदिक चिन्तन में योगदान

पण्डित मोतीलाल शास्त्री स्मारक व्याख्यान 2023आचार्य ज्वलन्त कुमार शास्त्री September 28,2023 पण्डित मधुसूदन ओझा का वैदिक चिन्तन में योगदान प्रतिवेदन श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान, नई दिल्ली द्वारा दिनांक २८ सितम्बर २०२३ को श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के वाचस्पति सभागार में पण्डित मोतीलाल शास्त्री स्मारक व्याख्यान का समायोजन किया गया । प्रख्यात वैदिक विद्वान् आचार्य ज्वलन्त कुमार शास्त्री ने ‘पण्डित मधुसूदन ओझा का वैदिक चिन्तन में योगदान’ विषय पर यह स्मारक व्याख्यान प्रस्तुत किया । अपने व्याख्यान में ज्वलन्त कुमार जी ने पं. मधुसूदन ओझा जी के जीवन परिचय को उद्घाटित करते हुए वैदिकविज्ञान परम्परा के महनीय आचार्य के रूप में ओझा जी के शिष्यों महामहोपाध्याय गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी, पण्डित मोतीलाल शास्त्री एवं डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल के नामों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि युधिष्ठिर मीमांसक ने अपनी आत्मकथा में पं. ओझा जी का उल्लेख किया है। युधिष्ठिर मीमांसक जी ने पं. ओझा जी से शास्त्राध्ययन किया था । सामान्य जन वेद चार है, यही जानते हैं। परन्तु शास्त्रप्रमाण से पं. ओझा जी ने वेदत्रयी का विवेचन किया है। ऋग्वेद पद्यात्मक, सामवेद गेयात्मक और यजुर्वेद में गद्य और पद्य दोनों का समावेश है। इस दृष्टि से वेदत्रयी है। तैत्तिरीयब्राह्मण के आधार पर तत्त्वात्मक चतुर्वेद की संकल्पना की गयी है। जिस में कहा गया है कि इस सृष्टि में जितनी मूर्तियाँ हैं वे सब ऋग्वेद के रूप हैं। इस सृष्टि में जो क्रिया अर्थात् गति है वह यजुर्वेद का रूप है और सभी पदार्थों में विद्यमान जो तेज है, वह समवेद है-ऋग्भ्यो जातां सर्वशो मूर्त्तिमाहुः, सर्वा गतिर्याजुषी हैव शश्वत् । सर्वं तेजं सामरूप्यं ह शश्वत्, सर्वं हेदं ब्रह्मणा हैव सृष्टम् ॥ (तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.१२.८.१) ओझा जी ने वेदार्थ निरूपण के लिए वैदिक पारिभाषिक शब्दों को प्रधान माना। पं. ओझा जी के अनुसार जब तक इन पारिभाषिक शब्दों का अर्थबोध स्पष्ट नहीं हो जाता है तब तक वेदार्थ स्पष्ट नहीं हो सकता है। पं. ओझा जी के यज्ञविज्ञान का अधार यजुर्वेद है। यजुर्वेद में ४० अध्याय हैं। इन ४० अध्यायों के प्रथम २० अध्यायों में यज्ञ के क्रमानुसार मन्त्र का उपस्थापन है। यज्ञ ही इस सृष्टि का मूल है, ऐसा पं. ओझा जी ने प्रतिपादित किया है। इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में विद्यमान श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक जी ने अपने उद्बोधन में बताया कि उन्होंने अपने छात्रजीवन काल में पं. ओझा जी के दशवादरहस्य का अध्ययन किया था। ऋग्वेद के नासदीयसूक्त के मन्त्र में दशवाद संबन्धी अवधारणा को लेकर पं. ओझा जी ने एक विशाल वाङ्मय का प्रणयन किया है। जिस में उन्होंने सदसद्वाद, अहोरात्रवाद, आवरणवाद, व्योमवाद, रजोवाद आदि वादग्रन्थों का प्रणयन किया है । नासदीयसूक्त की ऐसी व्याख्या अन्य आचार्यों ने नहीं किया है। पं. ओझा जी शास्त्रलेखन में तल्लीन रहते थे। वे अधिक यात्रा से बचते रहते थे। जिसका परिणाम है कि उन्होंने २८८ ग्रन्थों का प्रणयन किया । न केवल वे यात्रा से बचते रहते थे अपितु उन्होंने किसी वाद के रूप में वैदिकविज्ञान को प्रस्तुत नहीं किया है। उन्होंने वेद, ब्राह्मणग्रन्थ और पुराण में जैसा सृष्टिविज्ञान को देखा वैसा ही उन्होंने हम सब के समक्ष उपस्थापित किया है। विशिष्ट अतिथि के रूप में जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के संस्कृत विभागाध्यक्ष प्रो. गिरीश चन्द्र पन्त ने पं. मधुसूदन ओझाजी के अपरवाद ग्रन्थ में विविचित विषयों को उद्घाटित करते हुए पं. मधुसूदन ओझाजी के विदेश यात्रा के समय वैदेशिक विद्वानों के साथ हुयी उनकी रोचक वार्तालाप को भी रेखांकित किया। अध्यक्षीय उद्बोधन में उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्वकुलपति प्रो. देवी प्रसाद त्रिपाठी जी ने कहा कि पं. ओझा जी का चिन्तन अद्भुत है। उन्होंने बतलाया कि त्रिलोकी के माध्यम से भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः और सत्यम् इन वैदिक व्याहृतियों को व्याख्यायित किया गया है। भू का अर्थ पृथ्वी है और स्वः का अर्थ सूर्य है। इन दोनों के बीच में अन्तरिक्षरूप में भुवः है। स्वः लोक पृथ्वी स्थानीय, महः अन्तरिक्ष स्थानीय और जनः परमेष्ठी है। यह दूसरा त्रिलोकी है। फिर जनः पृथ्वी स्थानीय है, तपः अन्तरिक्षस्थानीय है और सत्यम् प्रजापति स्वयम्भू है। इस प्रकार यह तीसरा त्रिलोकी का रूप है। इन तीनों त्रिलोकियों का शास्त्रपरम्परा में रोदसी, क्रन्दसी और संयती के नाम से व्यवहार होता है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के संस्कृत एवं प्राच्यविद्या अध्ययन संस्थान के आचार्य तथा श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान के समन्वयक प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल ने विषय-प्रवर्तन करते हुए कहा कि श्रीशंकर शिक्षायतन प्रतिवर्ष २८ सितम्बर को यह कार्यक्रम निरन्तर समायोजित करता है। शिक्षायतन अनेक संगोष्ठी, वैदिकपरिचर्चा, कार्यशाला आदि उपक्रमों के माध्यम से वैदिकविज्ञान के क्षेत्र में निरन्तर कार्य कर रहा है। यद्यपि पं. ओझा जी का ग्रन्थ विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में न होने के कारण प्रचार-प्रसार से वंचित रहा है। इस का संकेत श्रीऋषिकुमार मिश्र के गुरु पं. मोतीलाल शास्त्री ने निर्देश किया था। मिश्र जी ने अपने गुरु के वचनों के आधार पर वैदिकविज्ञान के प्रचार प्रसार के लिए श्रीशंकर शिक्षायतन को संस्थापित किया है। प्रो. शुक्ल ने समागत सभी अतिथियों एवं श्रोतृवृन्दों का स्वागत तथा धन्यवाद ज्ञापन भी किया। कार्यक्रम का शुभारम्भ श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के आचार्यों प्रो. सुन्दर नारायण झा के द्वारा प्रस्तुत वैदिक मंगलाचरण से एवं प्रो.महानन्द झा के द्वारा प्रस्तुत लौकिक मंगलाचरण से हुआ। कार्यक्रम का संचालन श्रीशंकर शिक्षायतन के शोध अधिकारी डाँ. मणिशंकर द्विवेदी ने किया। वैदिकशान्तिपाठ से यह कार्यक्रम संपन्न हुआ।कार्यक्रम के आदि में श्रीशंकर शिक्षायतन के द्वारा प्रकाशित “वैदिक सृष्टि प्रकिया” नामक नवीन ग्रन्थ का लोकार्पण समागत अतिथियों के करकमलों के द्वारा किया गया। यह ग्रन्थ वैदिकविज्ञान के अनेक पक्षों को उद्घाटित करता है।इस कार्यक्रम में दिल्ली विश्वविद्यालय एवं तत्सम्बद्ध महाविद्यालयों, जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय, श्रीलाल बहादुरशास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के अनेक आचार्य, शोधछात्र एवं वैदिकविज्ञान में रुचि रखने वाले विद्वानों ने अपनी सहभागिता से इस कार्यक्रम को अत्यन्त सफल बनाया।

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राष्ट्रीय संगोष्ठी : शारीरकविमर्श

प्रतिवेदनश्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान, नई दिल्ली द्वारा ब्रह्मविज्ञानविमर्श शृंखला के अन्तर्गत दिनांक ३० मई २०२३ को शारीरकविमर्श विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी का समायोजन अन्तर्जालीय माध्यम से किया गया। यह संगोष्ठी पण्डित मधुसूदन ओझा प्रणीत शारीरकविमर्श नामक ग्रन्थ के चार प्रकरणों को आधार बनाकर समायोजित थी। जिसमें पाण्डिचेरी विश्वविद्यालय, पाण्डिचेरी के संस्कृत विभाग के आचार्य. प्रो. के. ई. धरणीधरण ने मुख्य वक्ता के रूप में तथा अन्य वक्ताओं में प्रो. के. गणपति भट्ट, आचार्य, अद्वैतवेदान्त विभाग, राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, तिरुपति, डॉ. रामचन्द्र शर्मा, सह आचार्य, न्यायविभाग, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वद्यालय, नई दिल्ली तथा डॉ. देवेश कुमार मिश्र, सह आचार्य, संस्कृत विभाग, इन्दिरा गाँधी मुक्त विश्वविद्यालय नई दिल्ली ने व्याख्यान प्रस्तुत किया। यह संगोष्ठी श्रीशंकर शिक्षायतन के समन्वयक तथा संस्कृत एवं प्राच्य अध्ययन संस्थान, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आचार्य प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई। पं. मधुसूदन ओझा प्रणीत शारीरकविर्मश अद्वैतवेदान्त का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण एक मौलिक ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में कुल सोलह प्रकरण हैं। जिसके पहले, दूसरे, तीसरे एवं पाँचवें प्रकरण को आधार बना कर वक्ताओं ने व्याख्यान दिये। ब्रह्म-मीमांसा-प्रवृत्तिनिमित्त नामक पहले प्रकरण के अनुसार ब्रह्म तत्त्व सृष्टि का मूल कारण है। मीमांसा का अर्थ विचार होता है। प्रवृत्तिनिमित्त का अर्थ कारण है। इस प्रकार ब्रह्म के विचार का जो कारण है। उस विषय पर विचार यहाँ प्रारंभ होता है। इस अध्याय में बारह उपशीर्षक हैं। जिसमें पं. ओझा जी ने सृष्टि के मूलकारण के रूप में क्रमशः दैवतत्त्व, रजस्तत्त्व, अपरतत्त्व, आपतत्त्व, वाक्-तत्त्व, व्योमतत्त्व, सदसत्-तत्त्व, अमृतमृत्युतत्त्व एवं संशयतत्त्व को उपस्थापित किया है। संगोष्ठी के मुख्य वक्ता प्रो. के. ई. धरणीधरण ने इसी प्रकरण पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने अपने व्याख्यान में सृष्टिकारक प्रत्येक तत्त्व पर विचार करते हुए कहा कि सृष्टि वाक् तत्त्व से होती है, यह व्याकरणदर्शन का सिद्धान्त है। श्रुति में ‘वागेव विश्वा भुवनानि जज्ञे’ यह वाक्य प्राप्त होता है। विश्व की सृष्टि में ब्रह्म मूल कारण है। वह ब्रह्म तत्त्व एक है अथवा अनेक। इस पर विचार करते हुए ग्रन्थकार पं. ओझा जी ने कहा कि सृष्टि से पूर्व ब्रह्म तत्त्व ही था । (‘ब्रह्म वा इदमग्र आसीत् एकमेव’, बृहदारण्यक उपनिषद् १.४.१०) ब्रह्म तत्त्व एक ही है, अनेक नहीं है। ‘तथा चेदं ब्रह्मैकमेवेति सिद्धान्तः।’ (शारीरकविमर्श, पृ.१०, हिन्दी अनुवाद संस्करण) दूसरे प्रकरण का नाम शास्त्र-ब्रह्म-मीमांसा है। यहाँ शास्त्र का अर्थ श्रुति है। ब्रह्म का ज्ञान प्रत्यक्ष से नहीं हो सकता क्योंकि इन्द्रिय ब्रह्म को जानने में समर्थ नहीं है। अनुमान से ब्रह्म का बोध नहीं हो सकता क्योंकि अनुमान प्रत्यक्ष पर ही होता है। उपमान से ब्रह्म का बोध नहीं हो सकता क्योंकि ब्रह्म के समान कोई दूसरा उदाहरण नहीं है। शब्द से भी ब्रह्म का बोध नहीं हो सकता है क्योंकि शब्द में भी ब्रह्म को बतलाने की शक्ति नहीं है। फिर भी शब्द ब्रह्म का संकेत मात्र करता है । वैदिकविज्ञान में शास्त्र का अर्थ वेद है और वह वेद ही ब्रह्म है। उस पर विचार करना यह शास्त्र-ब्रह्म-मीमांसा का अर्थ होता है। इस प्रकरण में छः उपशीर्षक हैं।इसी प्रकरण को आधार बना कर प्रो. के. गणपति भट्ट, ने अपने व्याख्यान में कहा कि ग्रन्थकार पं. ओझा जी ने ब्रह्म के दो स्वरूपों का प्रतिपादन किया है। एक आत्मब्रह्म है और दूसरा शास्त्रब्रह्म है। ग्रन्थकार पं. ओझा जी ने बृहदारण्यक उपनिषद् के आधार पर आत्मा को वाङ्मय, प्राणमय और मनोमय इन तीन रूपों में व्याख्यायित किया है तथा इसी के आधार पर आत्मा के तीन भावों को विविध रूपों में उद्धाटित करने का स्तुत्य प्रयास किया है। आत्मा के तीन भाव हैं- शान्तभाव, वीरभाव और पशुभाव । आत्मा के तीन तन्त्र हैं। यहाँ तन्त्र का अर्थ स्वरूप से है। आत्मा के तीन स्वरूप हैं- ज्ञान, कर्म और अर्थ। इन तीन तन्त्रों के द्योतक तीन वीर्य हैं। वीर्य का अर्थ सामर्थ्य होता है। आत्मा के तीन वीर्य हैं- ब्रह्म, क्षत्र और विट्। ब्रह्मवीर्य का अर्थ करते हुए ग्रन्थकार ने कहा है कि ज्ञान के उदय का जो साधन प्रतिभा अथवा तेज है वही ब्रह्म वीर्य है- ‘तत्र ज्ञानोदयौपयिकं वर्चोलक्षणं ब्रह्मवीर्यम्।’( शारीरकविमर्श, पृ. २७) कर्म की प्राप्ति उत्साह से होती है, यही क्षत्रवीर्य है। धन की प्राप्ति संग्रह से होती है, यह वीड्वीर्य है-“कर्मोदयौपयिकमित्साहलक्षणं क्षत्रवीर्यम्,वित्तसंचयौपयिकं संग्रहलक्षणं विड्वीर्यम्।” (वही) तीसरे प्रकरण का नाम वेदतत्त्वनिरुक्ति है। जिस प्रकार अद्वैतवेदान्त में ब्रह्म से सृष्टि होती है, न्याय-वैशेषिक में परमाणु से सृष्टि होती है, सांख्य-योग में प्रकृति और पुरुष से सृष्टि होती है। उसी प्रकार वैदिकविज्ञान में वेदतत्त्व से सृष्टि होती है। इस प्रकरण में कुल ग्यारह उपशीर्षक हैं। इसी प्रकरण को आधार बना कर डॉ. रामचन्द्र शर्मा, सह आचार्य, न्यायविभाग, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वद्यालय, नई दिल्ली ने अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया । उन्होंने विषय को स्पष्ट करते हुए कहा कि ग्रन्थकार ने वेदतत्त्व को अनेक रूपों में व्याख्यायित किया है। वाक् तत्त्व से सृष्टि होती है। वाक् तत्त्व मन और प्राण से हमेशा युक्त रहता है। सत्य स्वरूप वाली वाक् से ये (ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद) वेद हैं। ये वेद आत्मा की ही महिमा हैं। यह संपूर्ण सृष्टि ब्रह्म ही है। (सर्वं खल्विदं ब्रह्म)। प्रजापति ने इस विश्व को तीन रूपों में विभक्त किया है- ज्ञान, क्रिया और अर्थ। (१) ज्ञान के तीन रूप हैं- आनन्द, विज्ञान और मन। इस ज्ञान का जो प्रधान पुरुष है, वही चिदात्मा कहलाता है। इस चिदात्मा का जो महिमा है, वह मनोमय वेद है। (२) कर्म भी तीन प्रकार के हैं- मन, प्राण और वाक्। कर्म के प्रधान पुरुष को कर्मात्मा कहा जाता है। कर्मात्मा की महिमा प्राणमय वेद है। (३) अर्थ तीन प्रकार के हैं- वाक्, अप् और अग्नि। इस का जो प्रधान पुरुष है, वह भूतात्मा कहलाता है। इस भूतात्मा की महिमा वाङ्मय वेद है। ‘त्रयी वा एष विद्या तपति’ इस श्रुति वाक्य की अभिनव व्याख्या यहाँ प्राप्त होता है। पाँचवें प्रकरण का नाम वेदशाखाविभाग है। वेद की कितनी शाखायें हैं। इस विषय पर यहाँ चर्चा की गयी है। विज्ञानवेद और शास्त्रवेद इन दोनों वेद के समान रूप से विभाग होने पर वेद के एक हजार एक सौ इकतीस शाखाएँ हैं। इस प्रकरण के आधार पर व्याख्यान करते हुए डॉ. देवेश कुमार मिश्र ने बतलया कि वैदिकविज्ञान में ऋत और सत्य ये दो सृष्टिप्रतिपादक सैद्धान्तिक तत्त्व हैं। ऋत का अर्थ शून्य और सत्य का अर्थ पूर्ण होता है। आप (जल) तत्त्व ऋत और…

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