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Pitrsameeksha

The term pitr means ancestors. Pandit Madhsudan Ojha has written a comprehensive book on the subject of ancestors. The book opens with an explanation of theoretical elements of vedic science. The book then goes to offer an account of pitr or ancestors. According to Rigveda, there are three types of pitr–avar pitr, utparas pitr and madhyam pitr. Of these, avar pitra is the most important. पितृसमीक्षा सामान्यतया हम अपने पिता, पितामह या अधिक से अधिक प्रपितामह का नाम ही जानते हैं, हमारी पितृ-परम्परा में हुए सब पुरुषों का नाम हमें ज्ञात नहीं होता है । यदि हमें अपने एवं हमारे पितरों के स्वरूप को जानना है तो मूल सत्ता के स्वरूप को जानना पड़ेगा तथा ऋषि एवं मनु के स्वरूप को भी जानना पड़ेगा । इस विषय का वेद में विस्तृत प्रतिपादन किया गया है । इन तथ्यों की पूर्ण जानकारी हेतु सम्पूर्ण वैदिक साहित्य का आजीवन अनुशीलन कर ओझाजी द्वारा ‘पितृसमीक्षा’ ग्रन्थ की रचना की गयी है ।                   उदीरतामवर उत्परास उन्मध्यमाः पितरः सोम्यास । ऋग्वेद १०.१५.१ (पितृसमीक्षा, पृष्ठ १३) यहाँ अवर पितर को दिव्य पितर के नाम से, उत्तम पितर को ऋतु पितर के नाम से एवं मध्यम पितर को प्रेतर पितर के नाम से निर्देश किया गया है।                   ते चैते क्रमेण दिव्या ऋतवः प्रेताश्चेति भाव्याः।  (पितृसमीक्षा, पृष्ठ १३)  पुनः इन तीनों पितरों को अग्नि, यम और सोम के भेद से विवेचन को विस्तार किया गया है।          एषां पुनरेकैके मूलप्रकृतिभेदात् त्रिविधास्त्रिविधा इष्यन्ते, आग्नेयाः याम्याः सौम्याश्चेति। (वही, पृ. १३)                                            दिव्यपितर ७ प्रकार के  दिव्य पितर होते हैं- अग्निष्वात्त-    इनका नाम वैभ्राज है, ये चमकते रहते हैं, दक्षिणा दिशा में रहते हैं, अमूर्त (इनका कोई रूप नहीं होता है) और मध्यम पितर हैं। बर्हिषद्-       इनका नाम सोमपथ अथवा सोमपद है, अमूर्त और मध्यम पितर हैं। सोमसद्-      इनका नाम सनातन अथवा संतानक है, उत्तर दिशा में रहते हैं, अमूर्त और मध्यम पितर हैं। हविर्भुक्-      इनका नाम मारीच है, इन्द्र  प्राण प्रधान होने से क्षत्रियों के पितर हैं। मूर्ति रूप में रहते हैं। उत्तम पितर हैं। आज्यप-       ये तेजस्वी होते हैं, इनमें विश्वेदेव नाम के प्राण की प्राधानता होती है, वैश्य के पितर हैं, मूर्ति रूप में रहते हैं और उत्तम पितर हैं। सोमपा-        ये ज्योति रूप में प्रतीत होने वाले पितर हैं, इनमें अग्नि प्राण प्रधान होता है, ये ब्राह्मणों के पितर हैं, मूर्ति रूप में रहते हैं और उत्तम पितर हैं। सुकाली-       ये मानस पितर हैं, ये शूद्रों के पितर हैं, ये अवर पितर कहे जाते हैं और मूर्ति रूप में रहते हैं।                                                                                  (वही, पृष्ठ ३९)                                              ऋतुपितर जो अग्नि अपने मूल अवस्था से हट कर वायु रूप में परिणत होकर फैलने लगता है वह वायु ऋतु नाम से कहा जाता है।  ऋत रूप अग्नि में ऋतु शब्द का प्रयोग होता है। ऋत रूप अग्नि ही सोम रूप में विभक्त हो कर ऋतु  बन जाता है। योऽग्निः प्रभवात् प्रवृक्तो वायुसञ्चरति तदृतुम्। तारतम्येन सोमान्वयात्-संविभक्त-शरीरेस्मिन् ऋताग्नावृतुशब्दः। ऋताग्नय एअवैते सोमसंविभक्तकाया ऋतवः। (वही, पृ.३९) अग्निष्वात्त-शिशिर ऋतु, बर्हिषद्-हेमन्त ऋतु, सोमसद्-शरत् ऋतु,  हविर्भुक्-वर्षा ऋतु, आज्यप-ग्रीष्म ऋतु और सोमपा-वसन्त ऋतु है। (वही, पृष्ठ ४५ )                                     प्रेतपितर पृथ्वीलोक पर आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी इन  पाँचों की समष्टि से बनने वाली जीवात्मा ही भूतात्मा कहलाता है। जब जीवात्मा शरीर का त्याग कर गन्धर्व प्राण प्रधान शरीर को धारण करता है। गन्धर्वरूप से तेरह मासो में नक्षत्रों लोकों को पार करते हुए चन्द्रलोक को प्राप्त होता है। यही प्रेतपितर हैं। ये तीन प्रकार के हैं- परपितर, मध्यमपितर और अवरपितर हैं। ये ही क्रमशः नान्दीमुख पितर, पार्वण पितर और प्रेतपितर कहे जाते हैं। मध्यमपितर और अवरपितर की अपेक्षा से परपितर नान्दीमुख पितर कहलाता है। नान्दीमुख का अर्थ प्रसन्नमुख होता है। नान्दीमुख पितर सबसे उच्च स्थान में रहते हैं। ये हमेशा ऊर्ध्वमुख और अमूर्त (बिना आकार के) रहते हैं। ये प्रेतपितर भी सोमसद्, बहिषद् और  अग्निष्वात्त कहलाते हैं। पृथिवीलोकस्था भूतात्मानो देहत्यागादूर्ध्वं गान्धर्वशरीरा नक्षत्रैस्त्रयोदशमासैश्चन्द्रमसं गच्छन्ति। तेऽमी प्रेताः पितरस्त्रेधा निष्पद्यन्ते-परा मध्यमा अवराश्च। ते एव नान्दीमुखाः पार्वणाः प्रेताश्च। मध्यमावराणाम् अश्रुमुखत्वाद् अपेक्षया परेषां नान्दीमुखत्वम्। नान्दीमुखाः प्रसन्नमुखाः। ते चैते सर्वस्माद् अस्माद् उपरिष्टाद् वर्तन्ते। ऊर्ध्वमुखा अमूर्ताश्च। ते त्रिविधाः सोमसदः बर्हिषदः अग्निष्वात्ताश्च। (वही, पृ. ४८) इस प्रकार  पार्वणपितर, प्रेतपितृविज्ञान, गोत्रसन्तान, सपिण्डीकरण, श्राद्ध और गया पिण्डदान आदि विषय समाहित किये गये हैं।Read/Download                                    

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Varnasameeksha

Varnasamiksha is an important volume on linguistics. An integral part of this science of language is phonology. The volume presents a comprehensive view of phonology. Languages is studied through sentences. Every sentence is made up of alphabets. Another term for alphabet or varna is akshara. The volume is divided into two parts–Varnasamiksha and Gunasamiksha. The sanskrit term for Varnasamiksha is Pathyasvasti. वर्णसमीक्षा वर्णसमीक्षा भाषाविज्ञान का ग्रन्थ है। भाषाविज्ञान का एक अंग ध्वनिविज्ञान है। ध्वनिविज्ञान का यह ग्रन्थ अत्यन्त ही उपयोगी  है। भाषा का अध्ययन वाक्य के माध्यम से होता है। सबसे बड़ा वाक्य होता है। उस वाक्य में अनेक पद होते हैं और पदों में वर्ण होता है। ‘राम घर जाता है’ यह एक वाक्य है। इस में राम और घर पद है तथा ‘र् आ म् अ’ ये वर्ण हैं। वर्ण का ही दूसरा नाम अक्षर है। वर्ण की समीक्षा अर्थात् वर्ण के  सभी विषयों का यहाँ निरूपण किया गया है। पं. ओझा जी ने धर्म को प्रधान माना है। धर्म से ही मनुष्य उच्चता को प्राप्त करता है। धर्म का अर्थ क्रिया से है। कोई नियमित अध्ययन करता है, कोई नियम पूर्वक किसी की सेवा करता है, कोई नियमित व्यापार करता है और कोई  जीवन के लिए एक निश्चित कर्म को नियमित रूप से करता है। यही धर्म है। इसी से मानव को उन्नति मिलती है। इस सत्कर्म का ज्ञान वेद, पुराण आदि ग्रन्थों से प्राप्त होता है। ग्रन्थ में वाक्य, वाक्य में पद और पद में वर्ण होते हैं-                  धर्मादभ्युदयः सदाऽभ्युदयते धर्मश्च साहित्यतो                           विज्ञाप्योऽप्यविनाकृतं तदपि वा वाक्यैश्च वाक्यं पुनः ।                  संपद्येत पदैः पदं पुनरिदं वर्णाहितं वर्ण्यते                           तस्माद्वर्णनिरूपणं प्रथमतः कर्तुं समुद्यम्यते ॥ वर्णसमीक्षा पृ. १ इस ग्रन्थ में दो भाग हैं प्रथम भाग का नाम वर्णसमीक्षा है। जिसमें में मातृका, विवृति, स्वरभक्ति, यम आदि विषय हैं। दूसरे भाग का नाम गुणसमीक्षा है। जिसमें वाग् विज्ञान, वाक की उत्पत्ति, स्वरसमीक्षा हैं। मातृका- वर्ण अथवा अक्षर का ही नाम मातृका है। ये पाँच हैं- ब्रह्ममातृका, अक्षमातृका सिद्धमातृका, भूतमातृका। जिसमें स्वर और व्यञ्जनों का स्पष्ट भेद विद्यमान रहता है वह ब्रह्म आदि चार मतृकाएँ  हैं। जिस में स्वर और व्यञ्जनों का भेद स्पष्ट नहीं है वह अनार्यमातृका है।           इस ग्रन्थ के प्रारम्भ में वर्णों की संख्या पर विचार किया गया है। २१ स्वरवर्ण है और ४२ व्यञ्जन वर्ण हैं। इन दोनों के योग से ६३ वर्ण होते हैं।                      अत्रादितः एकविंशतिः स्वराः, ततो द्विगुणानि व्यञ्जनानि । वर्ण समीक्षा पृ. २ किसी किसी आचार्यों के विचार में ६४ वर्ण हैं ।  आचार्य कात्यायन के अनुसार इसकी संख्या ६५ है। किसी किसी के विचार में ७९ वर्ण हो जाते हैं। ७९ की संख्या को इस रूप में प्रस्तुत किया गया है। २२ स्वर, २५ स्पर्श, यकार- शकार ८  यम २०, और ४ अनुस्वार, विसर्ग, जिह्वामूलीय और उपध्मानीय ।                      एकोनाशीतिवर्णास्तु प्रोक्ताश्चात्र स्वयम्भुवा ।                  स्वराः द्वाविंशतिश्चैव स्पर्शानां पञ्चविंशतिः ।                  यादयः शादयश्चाष्टौ यमा विंशतिरेव च ।                  अनुस्वारो विसर्गश्च कपौ चापि पराश्रयौ ॥ वर्णसमीक्षा पृ. ३-४ वर्णसमीक्षा का वैदिक नाम पथ्यास्वस्ति है।  पं. ओझा जी ने वैदिक वर्णों का विश्लेषण पथ्यास्वस्ति नामक ग्रन्थों में किया है। व्याकरणविनोद नामक ग्रन्थ व्याकरण संबन्धी विषयों को सरलता से प्रतिपादन करते हुए वैदिक विज्ञान की दृष्टि से निरूपण किया है।     Read/Download

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Brahmasiddhanta with 2 Hindi translations and 1 with Sanskrit commentary

This volume deals with the establishment of brahmavad by Brahma, practical aspects of Brahma, practical aspects of Maya and the outcome of the interaction between Brahma and Maya.  The first book listed here is the Hindi translation of Ojhaji’s book by Devidut Pandit Chaturvedi and the second one contains a commentary on the subject by Giridhar Sharma Chaturvedi in Sanskrit.      ब्रह्मासिद्धान्त यह खंड ब्रह्मा द्वारा ब्रह्मवाद की स्थापना, ब्रह्मा के व्यावहारिक पहलुओं, माया के व्यावहारिक पहलुओं और ब्रह्मा और माया के बीच संपर्क के परिणाम से संबंधित है । यहां सूचीबद्ध पहली पुस्तक देवीदत्त पंडित चतुर्वेदी द्वारा ओझा जी की पुस्तक का हिंदी अनुवाद है और दूसरी में संस्कृत में गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी द्वारा इस विषय पर एक टिप्पणी है । Read/download Read/download—Brahmasiddhanta with Sanskrit tika Read/download—Brahmasiddhanta with Hindi translation

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Aithihasikodhyaya

Aithihasikodhyaya is part of Pandit Motilal Shastri’s Gitavijnana-bhashya. In this compact volume, Shastriji has described the epic battle between the Kauravas and Pandavas in a vivid explanation of the word, Kurukshetra. ऐथिहासिकोआध्याय ऐथिहासिकोआध्याय पंडित मोतीलाल शास्त्री रचित गीताविजय-भाष्य का हिस्सा है । इस संक्षिप्त खंड में, शास्त्री जी ने कौरवों और पांडवों के बीच महाकाव्य युद्ध का वर्णन कुरुक्षेत्र शब्द की विशद व्याख्या में किया है । Read/download

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Upanishad vijnana bhashya

Upanishad vijnana bhashya–Part IDuring the study of Upanishads and their commentaries, Shastriji discovered there were several disputes that need to be resolved scientifically. He decided to write a long essay on the subject. This essay, since then, has been divided into three volumes. In the first volume, the following have been elucidated: 1.Introduction; 2. Why is mangalacharan recited before and after the reading of Upanishads? 3. What is the meaning of Upanishad? and 4. Are Upanishads Veda? The introduction examines the skepticism about the Upanishads prevalent among modern Indians. Why is such profound knowledge ignored by the people? उपनिषद विज्ञानभाष्य–प्रथम भागउपनिषदों और उनकी टिप्पणियों के अध्ययन के दौरान, शास्त्रीजी ने पाया कि कई विवाद थे जिन्हें वैज्ञानिक रूप से हल करने की आवश्यकता है । उन्होंने इस विषय पर एक लंबा निबंध लिखने का फैसला किया । तब से यह निबंध तीन खंडों में विभाजित है । पहले खंड में, निम्नलिखित को स्पष्ट किया गया है: 1.परिचय; 2. उपनिषदों के पढ़ने से पहले और बाद में मंगलचरण का पाठ क्यों किया जाता है? 3. उपनिषद का अर्थ क्या है? और 4. क्या उपनिषद वेद हैं? परिचय आधुनिक भारतीयों के बीच प्रचलित उपनिषदों के बारे में संदेह की जांच करता है । लोगों द्वारा इस तरह के गहन ज्ञान की अनदेखी क्यों की जाती है? Read/download Upanishad-vijnana-bhashya Part IIThe second volume continues with the examination of whether the Upanishads are Veda. In the first volume, an overview of the same has been given. It is unfortunate that such a profound knowledge is lost on the present generation. It is clear that the people of this country have relied more on words given in veda-shastra than the true meaning of this knowledge. Do we need to forever validate the upanishad? उपनिषद विज्ञानभाष्य–भाग द्वितीयदूसरा खंड इस बात की परीक्षा के साथ जारी है कि क्या उपनिषद वेद हैं । पहले खंड में उसी का अवलोकन दिया गया है । यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि वर्तमान पीढ़ी पर इतना गहरा ज्ञान खो गया है । यह स्पष्ट है कि इस देश के लोगों ने इस ज्ञान के वास्तविक अर्थ की तुलना में वेद-शास्त्र में दिए गए शब्दों पर अधिक भरोसा किया है । क्या हमें हमेशा के लिए उपनिषद को मान्य करने की आवश्यकता है? Read/download Upanishad-vijnana-bhashya Part IIIThe final volume of the commentary is called vedanta. Keeping Brahma at the centre, the volume explains the basic explanations of science of the universe. The volume also deals with the profound question whether the Upanishad is man-made or not. उपनिषद विज्ञानभाष्य –भाग तृतीयटीका के अंतिम खंड को वेदांत कहा जाता है । ब्रह्मा को केंद्र में रखते हुए, यह ग्रंथ ब्रह्मांड के विज्ञान की बुनियादी व्याख्याओं की व्याख्या करता है । यह ग्रंथ इस गहन प्रश्न से भी संबंधित है कि उपनिषद मानव निर्मित है या नहीं ।Read/download Ishopanishad-vijnana-bhashyaईशोपनिषद्विज्ञानभाष्यRead/Download Kenopanishad-vijnana-bhashyaकेनोपनिषद्द्विज्ञानभाष्यRead/Download Mundakopanishad-vijnana-bhashyaमुण्डकोपनिषद्द्विज्ञानभाष्यRead/Download Mandukyopanishad-vijnana-bhashyaमाण्डूक्योपनिषद्द्विज्ञानभाष्यRead/Download Prashnopanishad-vijnana-bhashyaPrashnopanishad is an important Upanishad. Pandit Motilal Shastri has referred to it as Pippalodapanishad or Pranopanishad. There are six questions in this upanishad. These are on parameshti mahan, saur vijnanatma, chandra pragyanatma, parthiv pranatmaka, svaymbhu avavyatma and purushatma. The bashya gives a detailed account of these. It is considered to be one of the finest works of Shastriji. Shodashi purusha is infused with five pranas–avyaktaprana, mahatprana,vijnanaprana,pragyanprana and pashuprana. These are in some definitions termed as vishvasrit. These are termed as prana, apah,vaka, anna and annada–the brahmasatya. प्रशनोपनिषद-विज्ञान-भाष्यप्रशनोपनिषद एक महत्वपूर्ण उपनिषद है । पंडित मोतीलाल शास्त्री ने इसे पिपलोदापनिषद या प्राणोपनिषद कहा है । इस उपनिषद में छह प्रश्न हैं। ये परमशक्ति महान, सौर विज्ञान, चंद्र प्रज्ञानात्मा, पार्थिव प्राणात्मक, स्वयंभू अवव्यात्मा और पुरुषात्मा पर हैं । यह शास्त्रीजी की बेहतरीन कृतियों में से एक मानी जाती है । षोडशी पुरुष पांच प्राणों से प्रभावित है-अव्यक्त, महात्माना,विज्ञानप्राना,प्रज्ञानप्राना और पशुप्राना । इन्हें कुछ परिभाषाओं में कहा जाता है विश्वाश्रित । इन्हें प्राण, पापा, वाका, अन्ना और अन्नदा कहा जाता है-ब्रह्मा सत्य ।Read/downloadKatopanishad-vijnana-bhashyaKatopanishad has an important place among Upanishads.This upanishad is famous as the dialogue between Nachiketa and Yama, the deity of death. Offered by his father in a yajna, Nachiketa reaches paraloka in a a bodyless form. After waiting for three days, he meets with Yama. Yama asks Nachiketa to see three blessings for the three days he had to wait.Along with asking the three blessings, Nachiketa asks fundamental questions on life and death. Yama answers them. The Upanishad contains explanations of many philosophical questions. Pandit Motilal Shastri says that the primary focus, however, is on bhoktatma. This book by Pandit Motilal Shastri is considered to be one of his finest commentaries.कटोपनिषाद्विज्ञान-भाष्यउपनिषदों में कटोपनिषद का महत्वपूर्ण स्थान है । यह उपनिषद मृत्यु के देवता नचिकेता और यम के बीच संवाद के रूप में प्रसिद्ध है । एक यज्ञ में अपने पिता द्वारा प्रस्तुत, नचिकेता एक शरीर रहित रूप में परलोक तक पहुँचता है । तीन दिनों के इंतजार के बाद, वह यम से मिलता है । यम ने नचिकेता से तीन दिनों तक तीन आशीर्वाद देखने के लिए कहा। तीन आशीर्वाद पूछने के साथ, नचिकेता जीवन और मृत्यु पर मौलिक प्रश्न पूछता है । यम उन्हें जवाब देता है । उपनिषद में कई दार्शनिक प्रश्नों की व्याख्या है । पंडित मोतीलाल शास्त्री कहते हैं कि प्राथमिक ध्यान भोक्तात्मा पर है । पंडित मोतीलाल शास्त्री की यह पुस्तक उनकी बेहतरीन टिप्पणियों में से एक मानी जाती है ।Read/download

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Shatpatha Brahmana

Shatpatha Brahmana has 100 chapters. This volume contains a comprehensive explanation of Yajurveda. Yajurveda, in conventional terms, is one of the four Vedas. In terms of tatva or essence, it is Yajurveda. There are two words in it–yath and ju. These refer to prana (life-force), vayu (air), gathi (movement) and vak (speech). Shastriji’s elucidation of Shatpatha Brahmana in Hindi offers insight into various aspects of Yajurveda.    शतपथ ब्राह्मण शतपथ ब्राह्मण में 100 अध्याय हैं । इस खंड में यजुर्वेद की व्यापक व्याख्या है । यजुर वेद, पारंपरिक शब्दों में, चार वेदों में से एक है । तत्त्व या सार के संदर्भ में, यह यजुर्वेद है । इसमें दो शब्द हैं-यथ और जू। ये प्राण , वायु , गति और वाक का उल्लेख करते हैं । शास्त्रीजी की हिंदी में शतपथ ब्राह्मण की व्याख्या यजुर्वेद के विभिन्न पहलुओं में अंतर्दृष्टि प्रदान करती है । Read/download Volume 1 Part 1 Read/download Volume 1 Part 2 Read/download Volume 1 Part 3 Read/download Volume 3 Part 2 Read/download Volume 4 Part 1 Read/download Volume 4 Part 2

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Bharatiya Hindu Manav aur Uski Bhavukta (including the short version)

This is a fairly voluminous work on Indian philosophy.  Pandit Motilal Shastri has drawn extensively from the Vedas and puranas to present new dimensions of Indian philosophy.  There are two versions of the book–the longer version is given below, followed by the short version. भारतीय हिन्दू-मानव और उसकी भावुकता—पूर्ण संस्करण भूमिका-(पृष्ठ १-१८) के लेखक प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो. वासुदेवशरण अग्रवाल है। पुरुष के विषय में लिखते हुए शतपथब्राह्मण को उद्धृत किया गया है। ‘पुरुषो वै प्रजापतेर्नेदिष्ठम्, ४.३.४.३’ पुरुष प्रजापति के निकटतम है। पुरुष प्रजापति की सच्ची प्रतिमा है। प्रजापति मूल है, तो पुरुष उसकी ठीक प्रतिकृति है। (पृ.१) किमपि प्रास्ताविकम्-(पृष्ठ १-२०) के अन्तर्गत पं. शास्त्री जी ने ‘आत्मा उ एकः सन्नेतत् त्रयम्,  त्रयं सदेकमयमात्मा, (बृहदारण्यक १.६.३)’ एक ही तत्त्व सृष्टि काल में दैवतभाव में, आत्मभाव में और भूतभावों में व्यक्त रहता है। प्रतिसर्ग की दशा में तीनों तत्त्व एक ही रूप में परिणत हो जता है। (पृ.८) असदाख्यान-मीमांसा– (पृ.१-१३२) यह प्रथम स्तम्भ है। भारतीय उसासनाकाण्ड में उपासक की लक्ष्यसिद्धि के लिए प्रतिमा को माध्यम माना गया है। ‘माइथा’ शब्द मिथ्याभाव का संग्राहक है। ‘लाजी’ शब्द ज्ञानशब्द का संग्राहक है। माइथालाजी का अर्थ मिथ्याज्ञान है। यही तात्पर्य असदाख्यान का है। (पृ.६) युधिष्ठिर प्रमुख पाण्डव सर्वात्मना दुःखार्त एवं दुर्योधन कौरव सर्वात्मना सुखी और समृद्ध क्यों और कैसे? यह मूल प्रश्न है। जिसका हिन्दू मानव की भावुकता के माध्यम से इस निबन्ध में विश्लेषण किया जायेगा  । (पृ. २३) विश्वस्वरूप-मीमांसा- (पृ. १३६-४४७) यह द्वितीय स्तम्भ है। विश्व शब्द पर विचार करते हुए कहा गया है कि प्रवेशनार्थक ‘विश’ धातु से ‘क्वुन्’ प्रत्यय द्वारा विश्व शब्द बना है। ‘विशति अत्र आत्मा, तद् विश्वम्’। जहाँ आत्मा प्रविष्ट रहता है, वह विश्व है। (पृ.१३७) तात्त्विक दृष्टि से विश्व शब्द का अर्थ ‘सर्व’ है।‘विश्वानि देव, यजुर्वेद ३.२०’। शतपथब्राह्मण में भी जो विश्व है वही सब कुछ है। ‘यद्वै विश्वं, सर्वम् तत्, शतपथब्राह्मण ३.१.२.११’। एकत्व आत्मनिबन्धन है और अनेकत्व विश्वनिबन्धन है। अमृतलक्षण आत्मा अखण्ड है, एकाकी है। मृत्युलक्षण क्षरात्मक विश्व खण्ड खण्डात्मक बनता हुआ नानाभावापन्न है। इसके लिए बृहदारण्यक उपनिषद् प्रमाण है।                   मृत्योः स मृत्युमाप्नोति, य इह नानेव पश्यति।  ४.४.१९ (पृ. १३८) वाक् शब्द पर विश्लेषण करते हुए कहा गया है कि मन, प्राण और बल ये तीन तत्त्व है। मन के लिए ‘अ’ का, प्राण के लिए ‘उ’ का और बल के लिए ‘अच्’ का ग्रहण किया जाता है। ‘उ’ का संप्रसारण होकर अर्थात् ‘उ’ बदल कर ‘व्’ हो जाता है। ‘व्+ अ+ अच्’ इस स्थिति में ‘अ+ अच्’ मिलकर ‘आच्’ हो गया। पुनः ‘व्’ से मिल कर ‘वाच्’ होता हुआ वाक् बन जाता है। (पृ. २५३) Bharatiya Hindu Manav aur Uski Bhavukta—Short version This is the short version of the above volume. भारतीय हिन्दू-मानव और उसकी भावुकता–-लघु संस्करण भारतीय हिन्दू मानव और उसकी भावुकता नाम से जो बड़ा ग्रन्थ है। उसी ग्रन्थ को संक्षेप में लघुरूप में पाठक के रुचि को बढ़ाने  के लिए संकलित किया गया है।भावुकता के लिए महाभारत की कथा को आधार बनाया गया है। पाण्डव में सब गुण होते हुए भी वे दुःखी थे। कौरव में सब दोष होते हुए भी वे सुखी थे। इसका कारण भावुकता है। पाण्डव में भावुकता थी और कौरव में निष्ठा थी। (पृ.१-२) द्यूतकर्म से प्रभावित धर्मभीरु युधिष्ठिर ने प्रत्यक्ष से प्रभावित होकर सती द्रौपदी को दाव पर लगा दिया। द्यूत जैसे निन्दनीय कर्म के साथ प्रतिज्ञापालन जैसे धर्म तत्त्व का ग्रन्थिबन्धन करने की भावुकता करते हुए युधिष्ठिर ने आपना राज्य खो दिया। (पृ.४) चार प्रकार के मानव को आधार बना कर विषय को स्पष्ट किया गया है। ये हैं-आत्मा, मन, बुद्धि और शरीर।बुद्धि, मन और शरीर से संबद्ध आत्मा को प्रधान मानने वाला मनुष्य हमेशा खुश रहता है। वह सभी समयों में निष्ठावान् रहता है।आत्मा, मन और शरीर से संबद्ध  बुद्धि को प्रधान मानने वाला मनुष्य हमेशा समृद्धि में रहता है। वह भविष्य को सोच कर विश्वासी रहता है। आत्मा, बुद्धि और शरीर से संबद्ध  मन को प्रधान मानने वाला मनुष्य हमेशा जीवन का निर्वाह मात्र करता है। वह वर्तमानकाल में रहता हुआ श्रद्धालु बना रहता है। आत्मा, बुद्धि और मन से संबद्ध  मन को प्रधान मानने वाला मनुष्य हमेशा भावुक रहता है। वह भूतकाल को सोचता हुआ लक्ष्यभ्रष्ट बना रहता है। (पृ. १३) उपनिषत्काल में भारतराष्ट्र और उसका मानव समाज अभ्युदय और निःश्रेयस के परम उत्कर्ष पर पहुँचा हुआ था।  यह काल भारतराष्ट्र का स्वर्णयुग था। छान्दोग्योपनिषद् को उद्धृत करते हुए लिखा गया है कि मेरे राज्य में एक भी चोर नहीं है, एक भी कृपण नहीं है, एक भी शराबी नहीं है, एक भी अनाग्निहिताग्नि नहीं है (सभी यज्ञ करने वाले हैं), एक भी मूर्ख नहीं है, एक भी व्यभिचारी नहीं है, फिर व्यभिचारिणी कहाँ से मिले। स ह (कैकेयः) प्रातः संजिहान उवाच न मे स्तेनो जनपदे, न कदर्यः, न मद्यपः, न अनाहिताग्निः, न अविद्वान्, न स्वैरी, न स्वैरिणी कुतः।  ५.११.५ (पृ.६०) उपनिषद् के इस वाक्य से हिन्दूशास्त्र की सर्वोत्कृष्ट व्यवहारिकता का एवं चरम सफलता का परिचय प्राप्त होता है। Read/download the longer version Read/download the short version

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Vijnanachitravali–I & II

Vijnana-chitravali ( illustrated science of Veda)  is a collection of illustrations and charts drawn by Pandit Madhusudan Ojha and Pandit Motilal Shastri in their many works. This volume is edited by Shastriji. These illustrations and drawings have been drawn from Shatapatha Brahmana, Gitavijnana-bhashya, Ishopanishath, Sradhvijnana and other works.   विज्ञान चित्रावली- प्रथम और द्वितीय विज्ञान चित्रावली (वेद का सचित्र विज्ञान) पंडित मधुसूदन ओझा और पंडित मोतीलाल शास्त्री द्वारा उनके कई कार्यों में तैयार किए गए चित्रों और चार्टों का एक संग्रह है । यह खंड शास्त्रीजी द्वारा संपादित किया गया है । ये दृष्टांत और चित्र शतपथ ब्राह्मण, गीतविजना-भाष्य, ईशोपनिषथ, श्राधविजना और अन्य कार्यों से तैयार किए गए हैं । Read/download Vijnanachitravali–I Read/download Vijnanachitravali- II

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Shvetakranti ka mahan sandesh

The book is based on three subjects- Human way of life– It is said in Manusmriti that animals are superior among living beings and the intelligent is superior among living beings. Bhootanaam Praanina: Shreshthaah, Praaninaam Buddhijivinah. Manu 1.96, (p.10) Man has been divided into four parts- body, mind, intellect and soul. The body is related to the earth, the mind is related to the moon and the intellect is related to the sun. The soul of a human being is indestructible. (p.11) Are we human?- Just as there is a relationship between the soul and the body, similarly there is a relationship between religion and ethics. Ethics is the body and religion is the soul. That policy is the policy which protects the form of religion. Religion is that religion which keeps the policy established on its basis engaged in the progress of the people. Political views have also been discussed in this book. Communism, Praja Samaj, Congressism, Ram Rajya based on the principle of economic equation, Hindu Sabha based on communal sentiments, provocative Jan Sanghism etc. are the ideologies prevalent at present. Presenting the outline of the colour-related revolution on the basis of the four elements of body, mind, intellect and soul, it has been said that the body is the black revolution (black), the mind is the yellow revolution (yellow), the intellect is the red revolution (red) and the soul is the white revolution (white). Great message– Brahma is said to be indestructible and that is the soul. The human who enters the assembly of Prajapati soul becomes famous by the power of indestructible self-respect. The white, pure, Sattva Guna, knowledge-oriented fame is related to Brahmin Varna. Fame of Kshatriyas is manliness (strength). Fame of Vaishyas is economic power. Fame of Brahmin is related to Sun and intellect element. Fame of Kshatriya is related to moon and mind element and fame of Vaishya is related to earth and body element. These three are the world. श्वेतक्रान्ति का महान् सन्देश      श्वेतक्रान्ति का महान् सन्देश नामक ग्रन्थ में तीन विषय को आधार बनाया गया है- मानवजीवनपद्धति- मनुस्मृति में कहा गया है कि जीवों में प्राणी श्रेष्ठ है और प्राणियों में बुद्धिमान् श्रेष्ठ है।                   भूतानां प्राणिनाः श्रेष्ठाः,  प्राणिनां बुद्धिजीविनः। मनु १.९६, (पृ.१०) मनुष्य का चार भागों में विभाग किया गया है- शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा। शरीर का पृथ्वीमण्डल से संबन्ध है, मन का चन्द्रमण्डल से संबन्ध है और बुद्धि का सूर्यमण्डल से संबन्ध है। मानव का आत्मा अव्ययप्रधान है। (पृ. ११) क्या हम मानव हैं- जिस प्रकार आत्मा और शरीर का संबन्ध है उसी प्रकार धर्म और नीति का संबन्ध है। नीति शरीर है और धर्म आत्मा है। वही नीति नीति है जो धर्मस्वरूप का संरक्षण करती है। धर्म वही धर्म है जो अपने आधार पर प्रतिष्ठित नीति को लोकाभ्युदय में प्रवृत्त रखता है। (पृ. १४६)  इस ग्रन्थ में राजनीतिक विचार भी किया गया है। अर्थ समीकरण के सिद्धान्त पर चलने वाला साम्यवाद (कम्यूनिज्म), प्रजासमाजवाद, काँग्रेसवाद, धर्मभावात्मक रामराज्यवाद, साम्प्रदायिकभावनुगत हिन्दूसभावाद, उत्तेजनात्मक जनसंघवाद आदि आदि वाद अभी चल रहे हैं। (पृ.४९) शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा इन चार तत्त्वों के आधार पर रंग संबन्धी क्रान्ति का रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए कहा गया है कि शरीर कृष्णक्रान्ति (काला) है, मन पीतक्रान्ति(पीला) है, बुद्धि रक्तक्रान्ति (लाल) है और आत्मा श्वेतक्रान्ति (सफेद) है। (पृ. १६४) अनुशीलन, अनुकरण, आचरण और अनुकरण ये चार हैं। अनुशीलन से ब्राह्मण का, अनुसरण से क्षत्रिय का, आचरण से वैश्य का और अनुकरण से शूद्र का संबन्ध है। पाँचवा तत्त्व अव्यय है। जिसके व्यक्तिधर्म, संविद्धर्म, पुरुषधर्म सनातन आदि हैं। (पृ. ११३) ब्रह्म को अव्यय कहा गया है और वही आत्मा है। प्रजापति आत्मा के सभारूप विग्रह में प्रविष्ट मानव अव्ययात्मनिष्ठ के बल पर सर्वात्मना उस यश से यशस्वी बन जाता है। जो श्वेत, शुभ्र, सत्त्वगुण, ज्ञाननिष्ठ यश का  संबन्ध ब्राह्मण वर्ण से है। क्षत्रियों का यश पौरुष (बल) है। वैश्यों का यश अर्थशक्ति है।  ब्राह्मण का यश सूर्य से एवं बुद्धि तत्त्व है। क्षत्रिय का यश चन्द्रमा से  एवं मन तत्त्व है और वैश्य का यश पृथ्वी से  एवं शरीर तत्त्व है। ये तीनों विश्व हैं। इसीलिए ये तीनों विश्वयश हैं। विश्वात्मयश अव्यय है। वही आत्मयश है। (पृ.१६८)    पिछले कई शताब्दियों से भारत की सांस्कृतिक और नैतिक प्रतिष्ठा में लगातार गिरावट आई है। यह हम सभी के लिए गंभीर चिंता का विषय होना चाहिए। भारत की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं के कारण, देश कई विचारों और विचारधाराओं का युद्धक्षेत्र बन गया है। Read/download

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Bharatiya Drishti Se Vijnana Shabd Ka Samanvaya

These is the compendium of Pandit Motilal Shastri’s talks delivered on the All India Radio, Jaipur, in 1953. In these talks, Shastriji has explained the scientific aspect of the Veda. He has presented the true scope and meaning of the Veda. Reading of these talks offers a new insight into the very concept of “vijnana` (science).  भारतीय दृष्टि से विज्ञान शब्द का समन्वययह ग्रन्थ 1953 में ऑल इंडिया रेडियो, जयपुर ,पर दी गई पंडित मोतीलाल शास्त्री वार्ता का संग्रह है । इन वार्ताओं में शास्त्री जी ने वेद के वैज्ञानिक पहलू की व्याख्या की है । उन्होंने वेद का वास्तविक दायरा और अर्थ प्रस्तुत किया है । इन वार्ताओं को पढ़ने से `विज्ञान`की अवधारणा में एक नई अंतर्दृष्टि मिलती है ।विज्ञान शब्द में ‘वि’ उपसर्ग और ज्ञान संज्ञा शब्द है। ‘वि’ के तीन अर्थ हैं- विविध, विशेष और विरुद्ध । ‘विशेषं ज्ञानं विज्ञानम्’, ‘विविधं ज्ञानं विज्ञानम्’ और ‘विरुद्धं ज्ञानं विज्ञानम्’। इन तीनों में ‘विरुद्धं ज्ञानं विज्ञानम्’ यह पक्ष ठीक नहीं है। बाकी दो अर्थों पर विचार आवश्यक है। विचार के लिए विविध और विशेष ही समुचित है। ‘विशेषभावानुगतं विशेषभावाभिन्नं विविधं ज्ञानम् एव विज्ञानम्’।(पृ. ८-९)। एकं ज्ञानम्- ज्ञानम्, विविधं ज्ञानं विज्ञानम्।ब्रह्मैवेदं सर्वम् (बृहदारण्यक उपनिषद्, २.४.६), (आत्मैवेदं सर्वम्, छान्दोग्योपनिषद् ७.२५.२ ) इस श्रुतिवाक्य में वह ब्रह्म ही सब कुछ है, यह श्रुति ब्रह्म को उद्देश्य मान कर ‘इदं सर्वम्’ इस विश्व का विधान करती है, ब्रह्म से विश्व की ओर आना विज्ञान का पक्ष है। सर्वं खल्विदं ब्रह्म (छान्दोग्योपनिषद् ३.१४.१) यह सब कुछ ब्रह्म ही है। यह श्रुति विश्व को उद्देश्य मान कर ब्रह्म का विधान करती है। विश्व से ब्रह्म की ओर आना, यह ज्ञानपक्ष है। (पृ. २३) ग्रन्थकार पं शास्त्री जी ने इस प्रकार के अनेक श्रुति को उद्दृत किया है। विज्ञान के लिए प्रजापति के सन्दर्भ में ब्राह्मण वाक्य उद्धृत करते हैं। प्रजापतिस्त्वेवेदं सर्वं यदिदं किञ्च (शतपथब्राह्मण २.१.२.११) ज्ञान के पक्ष में ब्राह्मण वाक्य है।(सर्वमु ह्येवैदं प्रजापतिः) (पृ. २३)सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म, यह श्रुति ज्ञान का द्योतक है और ‘नित्यं ज्ञानम् आनन्दं ब्रह्म’ यह श्रुति विज्ञान का द्योतक है।( पृ. २४) ज्ञान के लिए ब्रह्म और विज्ञान के लिए यज्ञ शब्द का प्रयोग होता है। इस प्रकार ब्रह्मविज्ञान और यज्ञविज्ञान ये दो धाराएँ हैं। (पृ.२९)अमृत मृत्यु की व्याख्या करते हैं। जो अमृत तत्त्व है वही जीव के शरीर में विद्यमान है। जो मनुष्य इस तत्त्व में नानात्व को देखता है वह मृत्यु से मृत्यु को ही प्राप्त होता है। इस श्रुति में जहाँ जहाँ नानाभावों का, अनेक भावों का, पृथक्भावों का स्वरूप विश्लेषण किया है। वहाँ वहाँ उनके साथ-साथ ही मृत्यु शब्द का संबन्ध है। नानात्व, भेदत्व, पृथक्त्व मृत्यु का धर्म है। अनेकत्व अभेदत्व, अपृथक्त्व अमृत का धर्म है। अमृत और मृत्यु से ज्ञान और विज्ञान को विश्लेषण किया गया है। (पृ. १०) यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह । मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥ कठोपनिषद् २.१.१० (पृ.१०)एकं वा इदं वि बभूव सर्व (ऋग्वेद ८.६८.२) इस में एक से अनेक की ओर जान विज्ञानपक्ष है। (पृ.२२) अब ग्रन्थकार ज्ञान और विज्ञान को ब्रह्म और यज्ञ से परिभाषित करते हैं। ज्ञानात्मक विज्ञान के लिए ‘ब्रह्म’ शब्द और विज्ञानात्मक विज्ञान के लिए ‘यज्ञ’ शब्द है। (पृ.२५) ब्रह्म और यज्ञ परस्पर आश्रित रहते हैं। यज्ञ ब्रह्म पर प्रतिष्ठित है और ब्रह्म भी यज्ञ के द्वारा विभूतिभाव में परिणत होता है। तस्मात् सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्। गीता ३.१५ (पृ. ४५) Read/download

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