राष्ट्रीय संगोष्ठी-शतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्य : परिस्तरण एवं पात्रासादन विमर्श -(शृंखला-३)

प्रतिवेदन श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान द्वारा दिनांक ३१ मार्च २०२६, मंगलवार को सायंकाल ५-७बजे तक अन्तर्जालीय माध्यम से राष्ट्रीय संगोष्ठी का समायोजन किया गया। पण्डित मोतीलाल शास्त्री प्रणीतशतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्य नामक ग्रन्थ के ‘परिस्तरण एवं पात्रासादन’ नामक प्रकरण पर विचार किया गया।इस ब्राह्मणग्रन्थ के विविध विषयों को आधार बना कर यह राष्ट्रीय संगोष्ठी समायोजित की गई थी। डॉ. ज्योत्स्ना द्विवेदी, सहायक आचार्य, संस्कृत विभाग, उच्चशिक्षा उत्कृष्टता संस्थान, शासकीय ठाकुर रणमतसिंह महाविद्यालय, रीवा, मध्य प्रदेश ने अपने व्याख्यान में कही कि शतपथब्राह्मण में ‘शूर्प-अग्निहोत्रहवणी,स्फ्य-कपालानि, शम्या-कृष्णाजिन, उलूखल-मूसल, दृशत्-उपल’ ये दस पात्र हैं । ये दस यज्ञपात्र को यज्ञशालामें रखे जाते हैं। इसी कर्म को पात्रासादन कहते हैं। इन पात्रों को युग्म रूप में रख कर पात्रासादन का विधानकिया जाता है। युग्म से ही सृष्टि होती है, ऐसी व्याख्या विज्ञानभाष्य में प्राप्त होता है। विज्ञानभाष्य में द्वन्द्वशब्द की व्याख्याख्या करते हुए कहा गया है कि किसी कार्य को एक मनुष्य करता है और उसी कार्य को दोमनुष्य भी करता है। जहाँ दो लोगों के द्वारा कार्य किया जाता है वहाँ शक्ति अधिक होती है। द्वन्द्व शब्द कीअभिनव व्याख्या पात्रासादन के क्रम में कि पण्डित मोतीलाल शास्त्री जी ने शतपथब्राह्मण विज्ञानभाष्य में कियाहै। डॉ. सपना चन्देल, सहायक आचार्य, संस्कृत सान्ध्यकालीन अध्ययन विभाग, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय,शिमला ने कही कि आध्यात्मिक जगत् का आधिदैविक जगत् के साथ संबन्ध ही यज्ञ है। जब जीवात्मा इश्वरात्मासे संबन्ध बनाता है तभी यज्ञ चलता है। पात्रासादन कर्म में ये दश पात्र मध्यस्थता का प्रतिपादन करता है। कहाँयह मध्यस्थता है इस विषय में विज्ञानभाष्यकार लिखते हैं कि जीवात्मा और ईश्वरात्मा के बीच मध्यस्थभाव कानिर्वाह ये दस पात्र करते हैं। डॉ. शिल्पा सिंह, सहायक आचार्य, संस्कृत विभाग, कला संकाय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी ने कहीकि यज्ञसृष्टि का मूल तत्त्व वाक् है। यज्ञ का पहला प्रवर्तक आपोमय परमेष्ठी है। सृष्टि दो प्रकार के हैं- अर्थसृष्टिऔर शब्दसृष्टि । परमेष्ठितत्त्व में भृगु और अङ्गिरा रहते हैं। इन दोनों तत्त्वों का वर्णन ऋतशब्द से एवं सत्यशब्दसे विस्तारपूर्वक ग्रन्थकार ने किया है। अङ्गिरा की घनावस्था ही अग्नि है। अग्नि वाक् बन कर मुख में प्रवेशकरता है। इस सिद्धान्त के अनुसार अग्नि ही शब्द की उत्पत्ति में प्रधान है। डॉ. रञ्जन लता, सहायक आचार्य, संस्कृत एवं प्राकृत विभाग, दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय,गोरखपुर ने कही कि वैदिकविज्ञान में त्रैलोक्य के माध्यम से सृष्टि का प्रतिपादन किया गया है। त्रैलोक्य में पृथ्वीपहली स्थान पर है। पृथिवी पर माछन्द और अग्नि देवता हैं। अन्तरिक्ष दूसरा है। अन्तरिक्ष में प्रमाच्छ्न्द औरवायु देवता रहता है। तीसरा लोक द्युलोक है। द्युलोक में प्रतिमाच्छन्द और सूर्य देवता हैं। पात्रासादन कर्म मेंदस पात्र होते हैं। दस छन्द भी हैं। छन्द से ही यह सृष्टि बनी है। परिस्तरणविध में पवित्र कुश को विस्तार पूर्वकयज्ञशाला में रखा जाता है। पात्रासादनविध में यज्ञ के उपयुक्त दस पात्र रखे जाते हैं। प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल, आचार्य, संस्कृत प्राच्य विद्याध्ययन संस्थान, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नईदिल्ली कार्यक्रम के अध्यक्ष थे। उन्होंने कहा कि आज देश के प्रख्यात विदुषियों का सारगर्भित व्याख्यान था। येसभी विदुषी स्वागत के योग्य हैं। इन्होंने कठिन परिश्रम से शतपथब्राह्मण के विषय को उद्घाटित किया है। जिसप्रकार प्रकृति में यज्ञ होता है उसी प्रकार भौतिक द्रव्य से हमलोग यज्ञ को करते हैं। इस प्रकरण में विराट् पुरुषका, छन्द का और यज्ञ के पात्रों का वैज्ञानिक दृष्टि से व्याख्या की गयी है। सृष्टि के विषय में जो नवीन तथ्यों काउपस्थापन है वही विज्ञान है। डॉ. कमलराज उपाध्याय, वेदाचार्य, ब्रह्मचारी महानन्द वेदपाठशाला, बुलन्दशहर, उत्तर प्रदेश ने सस्वर वैदिकमङ्गलाचरण का पाठ किया। कार्यक्रम का सञ्चालन श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान के शोध अधिकारीडॉ. लक्ष्मी कान्त विमल ने किया। इस कार्यक्रम में अनेक प्रान्तों के विश्वविद्याल और महाविद्याल के आचार्य,शोधछात्र, संस्कृत विद्या मे रुचि रखने वाले विद्वानों ने उत्साह पूर्वक भाग ग्रहण कर गोष्ठी को सफल बनाया।

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National Seminar:Shatapatha Brahmaṇa Vijnana Bhāshya: A Discussion on Apaṃ-Praṇayana (Part–2)

Report A National Seminar was organized by Shri Shankar Shikshayatan Vedic Research Institute on 28 February 2026 (Saturday) from 5:00–7:00 PM through an online platform. The seminar was based on various themes from the second Brāhmaṇa titled “Apāṃ-Praṇayana” in the work Śatapatha Brāhmaṇa Vijñāna Bhāṣya, composed by Pandit Motilal Shastri. Prof. Gopal Prasad Sharma, Professor in the Department of Veda at Shri Lal Bahadur Shastri National Sanskrit University, New Delhi, stated during his discussion on Apāṃ-Praṇayana that the Adhvaryu priest sits to the north of the Gārhapatya fire. Placing the Praṇīta vessel on his left hand, he fills it with water using his right hand. This ritual act within the sacrificial procedure is called Apāṃ-Praṇayana. Dr. Prachetas, Assistant Professor in the Department of Sanskrit at Allahabad University, Prayagraj, explained that Brahma-Prajāpati has four “faces”: Prāṇa (vital force), Ap (water), Vāk (speech), and Anna–Annāda (food and eater of food). Among these, the second face is called Āpomaya (composed of water). From this water-formed aspect of Brahmā arises the creation of the worlds (loka-sṛṣṭi). For this cosmic creation to take place, the sacrificial process known as Apāṃ-Praṇayana continually operates within nature. Dr. Ramashankar Mishra, Assistant Professor in the Department of Veda at Maharshi Panini Sanskrit and Vedic University, Ujjain, stated that Prajāpati is the principal being in the sacrifice. The word “ka” signifies water, and it is also used to denote Prajāpati. The question of how this term should be connected is clarified through the explanation of the mantra “kasmai yunakti”, which indicates that “ka” refers to Prajāpati. In the Vijñāna Bhāṣya on the Śatapatha Brāhmaṇa, Prajāpati has been explained in great detail. Shri Pranav Kashyap, Assistant Professor in the Department of Veda at Central Sanskrit University, Lucknow Campus, stated that creation occurs through the union of two vital principles: the feminine life-force (yoṣā-prāṇa) and the masculine life-force (vṛṣā-prāṇa). The seminar was presided over by Prof. Santosh Kumar Shukla, Professor at the Institute of Sanskrit and Indic Studies, Jawaharlal Nehru University, New Delhi. In his presidential remarks he said that the program was being conducted on the basis of the Śatapatha Brāhmaṇa. The Vijñāna Bhāṣya written by Pandit Motilal Shastri is extremely comprehensive and insightful. In this commentary, numerous symbolic interpretations have been firmly supported with references from the Brāhmaṇa texts. He also appreciated all the scholars who kindly delivered lectures at the Shikshayatan and expressed gratitude to both the speakers and the audience. At the beginning of the program, Dr. Satyavrata Pandey, Assistant Professor in the Department of Veda at Central Sanskrit University, Ranveer Campus, recited the Vedic invocation with proper intonation. The program was conducted by Dr. Lakshmi Kant Vimal, Research Officer at Shri Shankar Shikshayatan Vedic Research Institute. Professors, research scholars, and individuals interested in Sanskrit studies from various universities and colleges across different states participated enthusiastically in the event, making the seminar a successful one.

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राष्ट्रीय संगोष्ठी शतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्य : अपांप्रणयनविमर्श-(शृंखला-२)

प्रतिवेदन श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान द्वारा दिनांक २८ फरवरी २०२६, शनिवार को सायंकाल ५-७ बजे तक अन्तर्जालीय माध्यम से राष्ट्रीय संगोष्ठी का समायोजन किया गया। पण्डित मोतीलाल शास्त्री प्रणीतशतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्य नामक ग्रन्थ के द्वितीय ब्राह्मण का नाम ‘अपांप्रणयन’ है। इस ब्राह्मणग्रन्थ के विविधविषयों को आधार बना कर यह राष्ट्रीय संगोष्ठी समायोजित की गई थी। प्रो. गोपाल प्रसाद शर्मा, आचार्य, वेदविभाग, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय,नई दिल्ली ने अपांप्रणयनविमर्श के क्रम में कहा कि गार्हपत्य अग्नि से उत्तरभाग में अध्वर्यु बैठता है। अध्वर्युअपने बायें हाथ पर प्रणीतापात्र को रख कर दायें हाथ से उस प्रणीतापात्र को जल से भरता है। इसी यज्ञीयक्रिया को अपांप्रणयन कहते हैं। डॉ. प्रचेतस्, सहायक आचार्य, संस्कृत विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज ने कहा कि ब्रह्मप्रजापतिके प्राण, आप, वाक्, अन्न- अन्नाद ये चार मुख हैं । उनके दूसरे मुख को आपोमय कहा गया है। ब्रह्मा के इसआपोमयमुख से लोकसृष्टि होती है। इस लोकसृष्टि करने के लिए प्रकृति में अपांप्रणयन यज्ञीय विधान होतारहता है। डॉ. रमाशंकर मिश्र, सहायक आचार्य, वेदविभाग, महर्णि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय, उज्जैन नेकहा कि प्रजापति ही यज्ञ में प्रधानपुरुष हैं। ‘क’ इस शब्द का अर्थ जल है तथा ‘क’ इस पद का अर्थ प्रजापतिभी होता है। किस के साथ इस को जोड़ा जाय, इस के लिए ‘कस्मै युनक्ति’ इति मन्त्र की व्याख्यान से यह विषयस्पष्ट होता है कि करूप प्रजापति ही है। शतपथब्राह्मण के विज्ञान भाष्य में प्रजापति का विस्तार से व्याख्या कीगयी है। श्रीप्रणव कश्यप, सहायक आचार्य, वेदविभाग, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय लक्ष्मणपुर परिसर ने कहा कियोषाप्राण और वृषाप्राण इन दोनों प्राणों के संयोग से सृष्टि होती है। प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल, आचार्य, संस्कृत प्राच्य विद्याध्ययन संस्थान, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नईदिल्ली कार्यक्रम के अध्यक्ष थे। उन्होंने कहा कि शतपथब्राह्मण को आधार बना कर कार्यक्रम चल रहा है । पण्डितमोतीलाल शास्त्री जी का विज्ञानभाष्य अत्यन्त विशद और सारगर्भित है। इस भाष्य में अनेक प्रतीकों का विवरण ब्राह्मणग्रन्थ के प्रमाण से दृढ किया गया है। आज के सभी आचार्य स्तुति के योग्य हैं। जो शिक्षायतन मेंआकर कृपा पूर्वक व्याख्यान करते हैं। ये सभी धन्यवाद के पात्र तथा श्रोता भी धन्यवाद के पात्र हैं।डॉ. सत्यव्रत पाण्डेय, सहायक आचार्य, वेद विभाग, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, रणवीर परिसर ने सस्वरवैदिक मङ्गलाचरण का पाठ किया। कार्यक्रम का सञ्चालन श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान के शोधअधिकारी डॉ. लक्ष्मी कान्त विमल ने किया। इस कार्यक्रम में अनेक प्रान्तों के विश्वविद्याल और महाविद्याल केआचार्य, शोधछात्र, संस्कृत विद्या मे रुचि रखने वाले विद्वानों ने उत्साह पूर्वक भाग ग्रहण कर गोष्ठी को सफल बनाया।

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National Seminar on Shatapatha Brahmana-Vratopayana–Part One

As part of our annual series of discussions on Shatapatha-Brahmana, the first seminar was organised on January 31, 2026. The focus of the discussion was the chapter titled Vratopāyana from the work Shatapatha-Brahmana-Vijñāna-Bhāṣya, composed by Paṇḍit Motilal Shastri. The seminar was organised on the basis of various themes drawn from this Brāhmaṇa text. Prof. Ramanuja Upadhyaya, Professor, Department of Veda, Shri Lal Bahadur Shastri National Sanskrit University, New Delhi, delivered a lecture on the topic of Vratopāyana. He stated that the discussion begins with acamana (ritual sipping of water). The Śatapatha Brāhmaṇa declares: “medhyā vā āpaḥ” (“waters are purifying”). In the Vijñāna-Bhāṣya, the term āpaḥ is interpreted as referring to the Soma principle. It is through the oblation of Soma that the Sun shines. The fiery Sun and the food-formed Moon are both described as dark in color; light emerges from the conjunction of these two principles. As proof regarding Soma, he cited the Ṛgvedic mantra: “tvaṃ jyotiṣā vitamo vavartha” (Ṛgveda 1.91.22). Dr. Ashish Mishra, Assistant Professor, Department of Veda, Central Sanskrit University, Tripura Campus, stated that heaven is attained through yajña. Through the Jyotishtoma sacrifice, the sacrificer reaches heaven. This yajña is related to the solar annual cycle (saura-saṃvatsara-maṇḍala). By means of this sacrifice, the sacrificer leaves the earthly self and, becoming free from birth, death, and old age, is established in the solar year. The solar year-fire is fourfold: day-night (ahorātra), fortnight (śukla and kṛṣṇa pakṣa), season (ṛtu), and solstice (ayana). From the perspective of day-night it is divided into 720 units (days and nights). From the standpoint of fortnights it is divided into 24 parts, since each month has two fortnights, making 24 in twelve months. According to seasons it has six divisions. From the standpoint of solstices it is twofold—uttarāyaṇa and dakshiṇāyana. After the solstitial stage, the sacrificer proceeds into the annual cosmic sphere. Dr. Patanjali Kumar Pandey, Assistant Professor, Department of Veda, Maharshi Panini Sanskrit and Vedic University, Ujjain, explained that Prajāpati has two forms—Satya and Vishva. The term Satya denotes the immortal, while Viśva denotes the mortal. The immortal is imperishable; the mortal is perishable. The principle of Satya is complete, peaceful, eternal, and blissful; the principle of Viśva is incomplete, restless, transient, and sorrowful. Though opposed like darkness and light, these two principles coexist. The mortal cannot exist without the immortal, nor the immortal without the mortal; they subsist in mutual relation. Just as water becomes hot when associated with fire—though their natures are opposed—so too these principles interact. In this context the Shatapatha Brahmaṇa states: “antaraṃ mṛtyor amṛtaṃ mṛtyāv amṛtam āhitam” (10.3.6.4). Dr. Dharmendra Kumar Pathak, Assistant Professor, Department of Veda, Central Sanskrit University, Lucknow Campus, explained that the Darśeṣṭi sacrifice is performed after the new moon, and the Pūrṇamāseshthi sacrifice after the full moon. Darśeṣṭi is conducted on the first lunar day (pratipadā) of the bright fortnight, while Pūrṇamāseṣṭi is conducted on the first lunar day of the dark fortnight. Thus, iṣṭi-sacrifices are performed on the pratipadā tithi. On the new moon day, observances such as the Vratopāyana rules connected with yajña are followed; hence Darśeṣṭi is also referred to as Amāvāsyā-iṣṭi. In his presidential address, Prof. Santosh Kumar Shukla, Professor, Institute of Sanskrit and Indological Studies, Jawaharlal Nehru University, New Delhi, remarked that all the speakers delivered clear and substantive lectures. The national seminar series on Śatapatha-Brāhmaṇa-Vijñāna-Bhāṣya will feature presentations by Vedic scholars from across the country. This year, each Brāhmaṇa section of the Śatapatha Brāhmaṇa will be analyzed as a separate theme. Prajāpati was a central subject of the present session, described as the creator of the entire universe. According to this doctrine, Prajāpati has two forms—Satya and Viśva—symbolizing soul and body respectively. The four principal elements of creation are avyaya, akshara, kshara, and parātpara; together they constitute the sixteenfold Prajāpati (shodasi). Avyaya, akshara, and kshara each possess five kalās, while the sixteenth principle is parātpara. Such a cosmological structure, he noted, is not found in other philosophical systems and represents a distinctive feature of Vedic science. Mr. Aniket Tripathi, research scholar, Department of Veda, Central Sanskrit University, Tripura, recited the Vedic maṅgalācaraṇa in traditional chant. The program was conducted by Dr. Lakshmi Kant Vimal, Research Officer at Shri Shankar Shikshayatan Vedic Research Institute. Professors, research scholars, and Sanskrit enthusiasts from universities and colleges across various regions participated enthusiastically, contributing to the success of the seminar.

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राष्ट्रीय संगोष्ठी– शतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्य : व्रतोपायनविमर्श – (शृंखला-१)

प्रतिवेदन श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान द्वारा दिनांक ३१ जनवरी २०२६, शनिवार को सायंकाल ५-७ बजे तक अन्तर्जालीय माध्यम से राष्ट्रीय संगोष्ठी का समायोजन किया गया। पण्डित मोतीलाल शास्त्री प्रणीतशतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्य नामक ग्रन्थ के प्रथम ब्राह्मण का नाम ‘व्रतोपायन’ है। इस ब्राह्मणग्रन्थ के विविधविषयों को आधार बना कर यह राष्ट्रीय संगोष्ठी समायोजित की गई थी। प्रो. रामानुज उपाध्याय, आचार्य, वेदविभाग, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय,नई दिल्ली ने व्रतोपायन विषय पर व्याख्यान करते हुए कहा कि इस प्रकरण में सर्वप्रथम आचमन पर विचारकिया गया है। शतपथब्राह्मण का वाक्य है.‘मेध्या वा आपः’। विज्ञानभाष्य में ‘आपः’ शब्द से सोमतत्त्व का ग्रहणकिया गया है। सोम की आहुति से ही सूर्य प्रकाशित होता है। अग्निमय सूर्य और अन्नमय चन्द्रमा ये दोनों वर्ण मेंकाले हैं। इन दोनों तत्त्वों के संयोग से प्रकाश निकलता है। सोम के विषय में ऋग्वेद का यह मन्त्र प्रमाण है-‘त्वंज्योतिषा वितमो ववर्थ’ (१.९१.२२) डॉ. आशीष मिश्र, सहायक आचार्य, वेदविभाग, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, त्रिपुरा-परिसर, ने कहाकि यज्ञ से स्वर्ग की प्राप्ति होती है। ज्योतिष्टोम नामक यज्ञ से यजमान स्वर्ग जाता है। इस यज्ञ कासौरसंवत्सरमण्डल से संबन्ध है। इस ज्योतिष्टोम यज्ञ के द्वारा यजमान पार्थिव आत्मा को छोड़कर जन्म-मरणऔर वृद्धावस्था से मुक्त होकर सौरसंवत्सर में प्रतिष्ठित होता है। सौरसंवत्सर अग्नि चार प्रकार के हैं- अहोरात्र,पक्ष (शुक्ल-कृष्ण), ऋतु और अयन। सौरसंवत्सर अग्नि अहोरात्र की अपेक्षा से ७२० (दिन-रात) के रूप मेंविभक्त हैं। पक्ष की दृष्टि से २४ भागों में विभक्त है, क्योंकि एक मास में २ पक्ष होते हैं । इस प्रकार १२ मास में२४ पक्ष होते हैं। ऋतु के अनुसार इसके ६ भाग हैं। अयन की दृष्टि से यह संवत्सर अग्नि दो प्रकार के हैं-उत्तरायण और दक्षिणायन। अयन के बाद यजमान संवत्सरमण्डल में गमन करता है। डॉ. पतञ्जलि कुमार पाण्डेय, सहायक आचार्य, वेदविभाग, महर्णि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिकविश्वविद्यालय, उज्जैन ने अपने व्याख्यान में कहा कि प्रजापति के दो रूप हैं- सत्य और विश्व। सत्य शब्द से अमृतका बोध होता है और विश्वशब्द से मृत क अबोध होता है। अमृत अविनाशी और मृत विनाशी है। सत्यतत्त्व पूर्ण,शान्त, नित्य, आनन्दपूर्ण है। विश्व तत्त्व अपूर्ण, अशान्त, अनित्य, और दुःखरूप है। ये दोनों अमृत और मृतअन्धकार और प्रकाश की तरह परस्पर विरुद्ध हैं फिर भी ये दोनों तत्त्व साथ साथ रहते हैं। अमृत के बिना मृतनहीं रह सकता है और मृत के बिना अमृत नहीं रह सकता है। ये दोनों परस्पर भाव में ही रहते हैं। जब अग्नि केसाथ जल का संबन्ध है। तब जल गर्म हो जाता है। जबकि ये दोनों परस्पर विरुद्ध स्वभाव वाले हैं। इसी दृष्टि कोध्यान में रखते हुए शतपथब्राह्मण में कहा गया है कि ‘अन्तरं मृत्योरमृतं मृत्यावमृतमाहितम्, १०.३.६.४’ डॉ. धर्मेन्द्र कुमार पाठक, सहायक आचार्य, वेदविभाग, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, लखनऊ परिसर ने कहाकि दर्शेष्टि याग अमावस्या के बाद होता है और पूर्णमासेष्टि याग पूर्णिमा के बाद होता है। शुक्लपक्ष के प्रतिपदातिथि को दर्शेष्टि याग होता है। कृष्णपक्ष के प्रतिपदा तिथि को पूर्णमासेष्टि याग होता है। इस का अर्थ यह हुआकि इष्टि याग प्रतिपदा तिथि को ही होता है। अमावास्या को ही यज्ञ से संबन्धित व्रतोपायन आदि नियमों कापालन किया जाता है। इस दृष्टि से दर्शेष्टि को अमावास्येष्टि इस नाम से भी प्रयोग किया जाता है। प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल, आचार्य, संस्कृत एवं प्राच्य विद्या अध्ययन संस्थान, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय,नई दिल्ली ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि आज के सभी वक्ता विद्वानों का व्याख्यान सुस्पष्ट औरसारगर्भित था। शतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्य नामक राष्ट्रीय संगोष्ठी में देश के सभी वैदिक विद्वानों का व्याख्यनहोगा । इस वर्ष शतपथब्राह्मण के प्रत्येक ब्राह्मण ग्रन्थों को आधार बना कर विषय का विश्लेषण किया जायेगा ।आज के विषय में प्रजापति एक मुख्य विषय है। इस प्रजापति ने संपूर्ण सृष्टि की रचना की। इस सिद्धान्त केअनुसार प्रजापति के दो रूप हैं- सत्य और विश्व। सत्य शाब्द से आत्मा का और विश्व शब्द से शरीर का ग्रहणहोता है। इस सृष्टि के अव्यय, अक्षर, क्षर और परात्पर ये चार प्रधान तत्त्व हैं। ये चारॊ मिलकर ही षोडशीप्रजापति कहलाते हैं। अव्यय, अक्षर और क्षर की पाँच कलाये हैं। सोलहवां तत्त्व परात्पर है। इस सृष्टि की यहसंरचना अन्य दर्शन में नहीं पाया जाता है। यही वैदिकविज्ञान की विशेषता है। श्रीमान् अनिकेत त्रिपाठी , शोधछात्र, वेद विभाग, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, त्रिपुरा ने ने सस्वर वैदिकमङ्गलाचरण का पाठ किया। कार्यक्रम का सञ्चालन श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान के शोध अधिकारीडॉ. लक्ष्मी कान्त विमल ने किया। इस कार्यक्रम में अनेक प्रान्तों के विश्वविद्याल और महाविद्याल के आचार्य,शोधछात्र, संस्कृत विद्या मे रुचि रखने वाले विद्वानों ने उत्साह पूर्वक भाग ग्रहण कर गोष्ठी को सफल बनाया।

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राष्ट्रीय संगोष्ठी–शतपथ ब्राह्मण श्रृंखला

हमें शतपथ ब्राह्मण पर चर्चाओं की सालाना श्रृंखला की घोषणा करते हुए खुशी हो रही है।   शतपथ ब्राह्मण में 100 अध्याय हैं । इस खंड में यजुर्वेद की व्यापक व्याख्या है । यजुर वेद, पारंपरिक शब्दों में, चार वेदों में से एक है । तत्त्व या सार के संदर्भ में, यह यजुर्वेद है । इसमें दो शब्द हैं-यथ और जू। ये प्राण , वायु , गति और वाक का उल्लेख करते हैं ।पंडित मोतीलाल शास्त्री की हिंदी में शतपथ ब्राह्मण की व्याख्या यजुर्वेद के विभिन्न पहलुओं में अंतर्दृष्टि प्रदान करती है ।इसे यहां पढ़ें–https://shankarshikshayatan.org/shatpatha-brahmana/ पहला सेमिनार 31 जनवरी, 2026 को ऑनलाइन हुआ था। विषय था: वृतोपयान। दूसरा सेमिनार 28 फरवरी, 2026 को हुआ था। चर्चा का विषय था: अपामप्रणायन परिसतरण और पात्रसादन (श्रृंखला 3) पर तीसरा सेमिनार 31 मार्च, 2026 को आयोजित किया गया। इस शृंखला का चौथा सेमिनार 30 अप्रैल, 2026 को आयोजित किया गया था । पांचवां सेमिनार 30 मई, 2026 को आयोजित किया गया था। छठा सेमिनार 29 जून, 2026 को आयोजित किया गया था। सातवाँ सेमिनार 31 जुलाई, 2026 कोआयोजित किया गया था। आठवाँ सेमिनार अगस्त 2026 के अंतिम सप्ताह में आयोजित किया जाएगा। आप सभी को सादर आमंत्रित किया जाता है।

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