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पण्डित मोतीलाल शास्त्री स्मारक व्याख्यान-2025

‘परम्परा और आधुनिकता का द्वन्द्व : समुद्रयात्रा’ प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी प्रतिवेदन बीसवीं शताब्दी के वैदिकविज्ञान के महान् शास्त्रचिन्तक पण्डित मोतीलाल शास्त्री संस्कृत जगत् में सुविख्यातहैं। उन्होंने राष्ट्रभाषा में एक सौ से अधिक ग्रन्थों को लिख कर एक अभिनव दृष्टि विद्वानों के सामने रखा है।उनकी व्याख्या शैली सर्वथा नयी है। वैदिकविज्ञान में पारिभाषिक शब्दों का विश्लेषण महत्त्वपूर्ण है। इसकीव्याख्या पण्डित मोतीलाल शास्त्री जी ने की है। इस वर्ष २८ सितम्बर २०२५, रविवार को श्रीलाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के वाचस्पति सभागार में यह स्मारक व्याख्यान सुसंपन्न हुआ है। श्रीशंकर शिक्षायतन इस कार्यक्रम को वार्षिक उत्सव के रूप में मनाता है। इस व्याख्यान में‘दशवादरहस्य : वैदिकसृष्टिवाद’ इस ग्रन्थ का विमोचन समागत अतिथियों के द्वारा किया गया। यह ग्रन्थ हिन्दीभाषा में लिखा गया है। यह ग्रन्थ २०२५ में विद्यानिधि प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित हुआ है । दशवादरहस्यग्रन्थ का अन्वय, हिन्दीभाषा में अनुवाद एवं कारिका के ऊपर व्याख्या की गयी है एवं दशवाद सिद्धान्त सेसंबन्धित विद्वानों के आलेख समाहित हैं। इस व्याख्यान में पूर्वकुलपति प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली ने‘परम्परा और आधुनिकता का द्वन्द्व : समुद्रयात्रा’ इस विषय पर अपना सारगर्भित व्याख्यान दिया है। इसविषय का संबन्ध पण्डित मधुसूदन ओझा के ‘प्रत्यन्तप्रस्थान-मीमांसा’ नामक ग्रन्थ के साथ है। १९०२ ई. मेंपण्डित मधुसूदन ओझा राजस्थान के महाराजा माधव सिंह के साथ इंगलैण्ड देश गये थे, वहाँ के महारानी केराज्याभिषेक महोत्सव का समायोजन हुआ था । उस समय समुद्रयात्रा विद्वत्समाज में निषिद्ध था। पण्डित ओझाजी ने वहाँ से लौटकर अपने देश भारत आकर समुद्रयात्रा के विषय की प्रासंगिकता के लिए इस ग्रन्थ की रचनाकी। प्रत्यन्त-प्रस्थान मीमांसा ग्रन्थ के प्रथम अध्याय का नाम सम्रुद्रयात्रा की कलिवर्ज्यता, द्वितीय अध्यायका नाम समुद्रयात्री के श्राद्धवर्ज्यता और तृतीय अध्याय का नाम ब्राह्मणवर्ज्यता है । इस लघुकाय ग्रन्थ में अनेकस्मृति वचनों को उधृत किया गया है। प्रो. त्रिपाठी जी ने कहा कि समुद्रयात्रा ऋग्वैदिककाल में, स्मृतिकाल में, मत्स्यावतार में एवंसंस्कृतसाहित्य में भी इस का प्रचुर सन्दर्भ प्राप्त होता है। प्रो. त्रिपाठी जी ने कहा कि जो कोई व्यक्ति समुद्रय यान से विदेश जाता था। उस गमन से तीन प्रकारके पातक होते थे। समुद्रयात्रा से उत्पन्न महापातक, विदेशयात्रा से महापातक, अन्यदेश वासियों के साथ संपर्कहोने से महापातक । यह व्यवस्था आधुनिक समय में भी प्रासंगिक है। सभी व्यक्ति सभी के साथ नहीं मिलताहै, सभी के साथ मिलकर खाना नहीं खाता है और न सभी के साथ मिलर बातचित करता है। अभी भी समाज मेंव्याहारिक असमानता दिखाई देती है । समुद्रयाने प्रत्यन्तदेशं गतवतैस्त्रैवर्णिकस्यावश्यं त्रेधा महापातक-सम्बन्धः संभाव्यते-समुद्रयात्रानिबन्धनः, प्रत्यन्त-देश-गमन-निबन्धनः, पतित-संसर्ग-निबन्धनश्च।प्रत्यन्तप्रस्थानमीमांसा पृ. ३ कार्यक्रम के प्रारम्भ में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के संस्कृत एवं प्राच्य विद्याध्ययन संस्थान केआचार्य प्रो. सन्तोष कुमार शुक्लः महोदय ने समागत अतिथियों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि जिस देशमें जो विहित है उस का पालन उसी देश में होता है। दूसरे देश में उस नियम का पालन नहीं होता है। जिसप्रकार दाक्षिण भारत में माम की बेटी से विवाह होता है, उत्तर भारत में यह नियम नहीं चलता है। वहाँ उसकानिषेध है। उसी प्रकार समुद्रयात्रा विषय में भी सभी नियम सभी स्थानों के लिए मान्य नहीं है। उत्तर भारत केलोगों के लिए समुद्रयात्रा सर्वथा निषिद्ध है । विधान-पारिजाते तु पञ्चधा विप्रतिपत्तिः इति आदिबौधायन-वचन-सिद्धं दाक्षिणात्यानां प्रकृत्यतादृश-विवाहस्य कलियुगेऽप्यादरनीयत्वं महत्याऽभटया प्रपञ्चितम्। तथाहि-इदञ्च यस्मिन् देशे अवगीतं तत्रैव कार्यं नान्यत्र तथाप्ययं मातुल-कन्याविवाहो यद्देशेऽविगीतःतद्देशीयैः एव कार्यः। तदुक्तं नृसिंहचर्यायां बौधायनेन-दक्षिण-देशे अनुपनीतेन भार्यया च सह भोजनम् । प्रत्यन्तप्रस्थानमीमांसा पृ. ४५ गोरखपुर पारिवारिक न्यायलय के प्रधान न्यायाधीशः श्रीमान् राजेश्वर शुक्ल ने मुख्य अतिथि के रूप मेंअपना उद्गार प्रकट किया। उन्होंने कहाँ कि हमलोगों के लिए जो प्राचीन नियम है उस नियम का ज्ञान आवश्यकहै। प्राचीन विषय इस समय हमलोग जान रहे हैं, यही आधुनिकता है। प्राचीन ज्ञान ही परम्परा है। इन दोनोंपरम्परा और आधुनिकता के मेल से हमलोगों का ज्ञान बढ़ेगा । प्रो. भारतेन्दु पाण्डेय महोदयः आचार्य एवं अध्यक्ष, संस्कृत विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय ने कार्यक्रमकी आध्यक्षता की । उन्होंने कहाँ कि समुद्रायात्रा प्रतिपादक प्रत्यन्तप्रस्थान मीमांसा पुस्तक से विषय काउद्घाटन किया । उन्होंने कहा कि कोई विद्वान् विषयविशेष के अनुरोध से समुद्रयात्रा की कलिवर्ज्यता कीव्यवस्था को उद्घाटित करते हैं। किसी किसी आचार्य ने कलियुग में समुद्रयात्रा की निषिद्धता को सिद्ध करते हैं।(क) कहीं पर सामान्य शास्त्रं को मान कर समुद्रयात्रा का निषेध किया गया है। (ख) कहीं पर रागवशसमुद्रयात्रा का प्रतिषेध किया गया है । (ग) कहीं दोषप्रसङ्ग के आधार पर निषेध हुआ है। (घ) कहीं परसामान्यजन के संपत्तिहीन होने से सामुद्रयात्रा का निषेध किया गया है। अथ अभियुक्तास्तु यावत् कलिवर्ज्य-साधारण्येन विषय-विशेष-व्यवस्थानमभ्यनुजानाना इत्थम्आचक्षते। एतस्मिन् कलिवर्ज्य-प्रकरणे नैकरूपेण सर्वे सर्वत्र निषेधाः प्रवर्तन्ते। क्वचित् तुसामान्यशास्त्रविहिता एवार्था विशेषे निवर्त्यन्तो क्वचिच्च रागप्राप्ताः। क्वचित् पुनर्दृष्ट-दोष-प्रसञ्जकाः।अथैवं क्वचित् शक्तिवैकल्यादिना सामान्यमनुष्यैः कर्तुम् अशक्या एव अर्थानुग्रहेण अभ्यनुज्ञारूपेणनिवर्त्यन्ते। प्रत्यन्तप्रस्थानमीमांसा पृ. २२ व्याख्यान के प्रारम्भ में श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के आचार्य प्रो. सुन्दर नारायण झाने वैदिक मङ्गलाचरण को एवं प्रो. महानन्द झा ने लौकिक मङ्गलाचरण को प्रस्तुत किया । कार्यक्रम कासञ्चालन जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के अतिथि अध्यापक डॉ. मणि शंकरद्विवेदी ने किया । श्रीशंकर शिक्षायतन के शोध अधिकारी डॉ. लक्ष्मीकन्त विमल समागात विद्वानों का धन्यवादज्ञापन किया।इस व्याख्यान में दिल्ली विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्याल, श्री लाल बहादुर शास्त्रीराष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालयके अनेक विद्वानों ने, शिक्षकों ने,शोधच्छात्रों ने तथा संस्कृत में अनुराग रखने वाले लोगों ने उत्साह पूर्वक भाग ग्रहण कर के कार्यक्रम को सफलबनाने में अपना अप्रतिम योगदान किया।

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राष्ट्रीय संगोष्ठी कादंबिनी– श्रृंखला X

श्री शंकर शिक्षायतन 31 अक्टूबर 2025 को मौसम विज्ञान पर पंडित मधुसूदन ओझा के महान कार्य कादंबिनी पर दसवीं चर्चा का आयोजन करेगा। अध्यक्ष: प्रोफेसर संतोष कुमार शुक्ला, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, संयोजक, श्री शंकर शिक्षायतन। वक्ता: प्रो. अमित कुमार शुक्ल, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी।डॉ प्रवेश व्यास. श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, दिल्ली।डॉ. ज्योति प्रसाद दाश, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, सदाशिव परिसर, पुरी, ओडिशा।डॉ. चंद्रकांत, महर्षि वाल्मिकी संस्कृत विश्वविद्यालय, कैथल, हरियाणा।

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National Seminar on Kadambini Part X

Shri Shankar Shikshaytan will be organising the tenth discussion on Pandit Madhusudan Ojha’s great work on weather science, Kadambini, on October 31,2025. Chair: Professor Santosh Kumar Shukla, Jawaharlal Nehru University, Convener, Shri Shankar Shikshayatan. Speakers: Prof. Amit Kumar Shukla, Sampurnananda Sanskrit University, Varanasi.Dr Pravesh Vyasya. Shri Lal Bahadur Shastri National Sanskrit University, Delhi.Dr. Jyoti Prasad Dash, Central Sanskrit University, Sadashiv Campus, Puri, Odisha.Dr. Chandrakant, Maharshi Valmiki Sanskrit University, Kaithal, Haryana.

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राष्ट्रीय संगोष्ठी कादंबिनी– श्रृंखला IX

30 सितम्बर, 2025 श्री शंकर शिक्षायतन, पंडित मधुसूदन ओझा के मौसम विज्ञान पर असाधारण ग्रंथ पर चर्चा की अपनी वार्षिक श्रृंखला के भाग के रूप में 30 सितंबर, 2025 को कादम्बिनी पर नौवीं संगोष्ठी का आयोजन कर रहा है। अध्यक्ष: प्रोफेसर संतोष कुमार शुक्ला,जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, संयोजक, श्री शंकर शिक्षायतन। वक्ता: डॉ. नीलांबर दाश, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, सदाशिव परिसर, पुरी, उड़ीसा।श्रीगोविंद नारायण दीक्षित, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, वेदव्यास परिसर, हिमाचल प्रदेश।डॉ. अभिषेक गौतम, राजीव गांधी परिसर, श्रृंगेरी, कर्नाटक।डॉ. नवीन पाण्डेय श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, दिल्ली।

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National Seminar on Kadambini Part IX

September 30,2025 Shri Shankar Shikshayatan is organising the ninth seminar on Kadambini on September 30,2025 as part of its annual series of discussions on Pandit Madhusudan Ojha’s extraordinary treatise on weather science. Chair: Professor Santosh Kumar Shukla, Jawaharlal Nehru University, Convener, Shri Shankar Shikshayatan. Speakers: Dr. Nilambar Dash, Central Sanskrit University, Sadashiv Campus, Puri, Odisha.Shri Govind Narayan Dixit, Central Sanskrit University, Vedavyas Campus, Himachal Pradesh.Dr. Abhishek Gautam, Central Sanskrit University, Rajiv Gandhi Campus, Sringeri, Karnataka.Dr. Naveen Pandey, Shri Lal Bahadur Shastri National Sanskrit University, Delhi.

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National Seminar on Kadambini-Ulkadhikara Part VIII

Shri Shankar Shikshayatan Vedic Research Institute organised a National Seminar on 30 August 2025 (Saturday), 5–7 PM, through an online platform. The seminar was based on themes from the Ulka Adhikara section of Kadambini, authored by Pandit Madhusudan Ojha. The programme began with a vedic invocation by Dr. Satyavrat Pandey (Maharshi Panini Sanskrit and Vedic University, Ujjain) and was moderated by Dr. Lakshmikant Vimal, Research Officer, Shri Shankar Shikshayatan. The seminar witnessed enthusiastic participation from professors, researchers, and Sanskrit scholars across various states, making the event a success.

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राष्ट्रीय संगोष्ठी-कादम्बिनी : उल्काधिकार विमर्श (शृंखला-८)

प्रतिवेदन श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान द्वारा दिनांक ३० अगस्त, शनिवार २०२५ को सायंकाल ५-७ बजे तक अन्तर्जालीय माध्यम से राष्ट्रीय संगोष्ठी का समायोजन किया गया। पण्डित मधुसूदन ओझा प्रणीत कादम्बिनी नामक ग्रन्थ के उल्काधिकार के विविध विषयों को आधार बना कर यह राष्ट्रीय संगोष्ठी समायोजित की गई थी। डॉ. अनिल कुमार, सहायक आचार्य, ज्योतिष विभाग, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, भोपाल परिसर, ने अपने वक्तव्य में कहा कि मेरा विषय सूर्य का संपात है। शनि और सूर्य का संपात हस्त नक्षत्र के आधे व्यतीत होने पर और रेवती नक्षत्र के अन्त होने पर होता है । इसके साथ ही कर्क राशि और मकर राशि के अठारहवें अंश में संपात की स्थिति बनती है। बृहस्पति और सूर्य का संपात आर्द्रा नक्षत्र के तृतीय भाग और रेवती नक्षत्र के आदि भाग में होता है। इसके साथ ही कर्क राशि और मकर राशि के दशम अंश में संपात की स्थिति बनती है। आदित्यार्धं च पूषान्ते संपातः शनि-सूर्ययोः । राशेरष्टादशे त्वंशे तुर्य्यस्य दशमस्य च ॥ आर्द्रातृतीये पूषाद्ये संपातो गुरु-सूर्ययोः। अंशे तु दशमे राशेस्तुर्य्यस्य दशमस्य च ॥ –कादम्बिनी पृ. १७६, कारिका २७१-२७२ डॉ. चन्दन होता, सहायक आचार्य, ज्योतिष विभाग, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, एकलव्य परिसर ने कादम्बिनी ग्रन्थ के उल्काधिकरण पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि आकाश में ग्रहगण जिस रास्ते से जाते हुए दिखाई देते हैं, वह रास्ता नाग नाम से जाना जाता है। उस रास्ते में जहाँ ग्रह रहता है, वह उस नाग का मुख कहलाता है। आकाश में जितने ग्रह हैं उतने नाग भी हैं। द्युलोक, पृथ्वीलोक और अन्तरिक्षलोक में अनन्त नाग हैं। किन्तु उन नागों में आठ नागों की प्रधानता है। येन येन यथा खेटाः गच्छन्तः प्रतिभान्ति ते ।स पन्था नाग इत्युक्तो यत्र खेटस्तदाननम्॥ खेचरा दिति यावन्तो नागास्तावन्त एव खे । दिवि भुव्यन्तरिक्षे च नागानन्त्येति तेऽष्टधा ॥ तत्रैव पृ. १७४, कारिका २५७-२५८ डॉ. मृत्युञ्जय कुमार तिवारी, सहायक आचार्य, ज्योतिर्विज्ञान विभाग, महर्षि पाणिनि सस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय, उज्जैन ने अपने वक्तव्य में कहा कि मेरा विषय चन्द्रमा का संपात है। सूर्य के मार्ग में चन्द्रमार्ग का संपात होना चन्द्रपात कहलाता है। वह दो प्रकार का होता है। इन में दक्षिण वाला राहु और उत्तर वाला केतु कहा जाता है। सूर्यमार्ग में राहु प्रतिदिन पश्चिम दिशा की तरफ जाता रहता है। इसकी नित्य की गति ३ कला और १०. ५० विकला होती है। सूर्यमार्गे चन्द्रमार्ग-संपातः पात उच्यते। स द्वेधा दक्षिणे राहुरुत्तरः केतुरुच्यते॥ रविमार्गेन्वहं राहुः पश्चिमामनुगच्छति । तिस्रः कलाः सार्धदश विकला गतिराह्निकी ॥ तत्रैव पृ. १७६, कारिका २७८-२७९ डॉ. योगेन्द्र कुमार शर्मा, सहायक आचार्य, वास्तुशास्त्र विभाग, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली, ने अपने वक्तव्य में कहा कि सूर्य और चन्द्र के ग्रहण के विषय में शुभाशुभफल का विचार किया जा चुका है। अब तारा ग्रहों के ग्रहण का फल कहा जाता है। पातास्थानादविक्षिप्तश्चन्द्रेणार्केण वैकभः। ताराग्रहो ग्रस्तबिम्बो जायते ग्रहणं हि तत् ॥ तत्रैव पृ. १७५, कारिका २६३ प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल, आचार्य, संस्कृत एवं प्राच्य विद्या अध्ययन संस्थान, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली ने कहा कि आज का विषय अत्यन्त ही प्रायोगिक है। प्रयोग के आधार पर ही इस विषय को समझा जा सकता है। राहु, केतु, तारा, दिग्दाह, पांसु, वर्षा और भूकंप ये छः वैकारिक भाव प्रकीर्णाध्याय में है। राहवः केतवस्तारा दिग्दाहः पांसुवर्षणम्।भूकम्पश्चेति षड् भावा उक्ता वैकारिकाह्वयाः॥ तत्रैव पृ. १७१, कारिका २१६ इन भावों में पृथ्वी, चन्द्रमा, बुध आदि परज्योति पिण्डों के प्रकाशरहित तमोमय आधे भाग को स्वर्भानु कहते हैं। ये परज्योतिषः पिण्डाः पृथ्वी-चन्द्र-बुधादयः। तेषां प्रकाशितादर्द्धादर्द्धमन्यत् तमोमयम् ।। तत्रैव पृ. १७२, कारिका २३२ डॉ. सत्यव्रत पाण्डेय, अतिथि अध्यापक, वेद विभग, महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय, उज्जैन ने सस्वर वैदिक मङ्गलाचरण का पाठ किया। कार्यक्रम का सञ्चालन श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान के शोध अधिकारी डॉ. लक्ष्मी कान्त विमल ने किया। इस कार्यक्रम में अनेक प्रान्तों के विश्वविद्याल और महाविद्याल के आचार्य, शोधछात्र, संस्कृत विद्या मे रुचि रखने वाले विद्वानों ने उत्साह पूर्वक भाग ग्रहण कर गोष्ठी को सफल बनाया।

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Pandit Motilal Shastri Memorial Lecture 2025-Journeying Overseas – A Clash between Tradition and Modernity

September 28, 2025 Noted Sanskrit scholar, Prof. Radhavallabh Tripathi, is expected to deliver the Pandit Motilal Shastri Memorial Lecture 2025 on September 28,2025. The lecture will be organised at Shri Lal Bahadur Shastri Rashtriya Sanskrit University. The topic of the lecture is: Journeying Overseas – A Clash between Tradition and Modernity The lecture is based on Pratyantaprasthanamimasa authored by Pandit Madhusudan Ojha in which he has presented a strong and well-reasoned argument in favor of foreign travel at a time when sailing overseas was widely regarded as a taboo and thought to be against the shastras. He wrote this work in the context of the coronation of King Edward VIII, to which all Indian rulers had been invited. Jaipur’s king, Sawai Madho Singh, was also required to attend the ceremony in London. As the royal guru, Ojhaji was consulted on whether such a long journey—spanning two to three months—was permissible under the shastras. While the king’s ministers and advisers expressed reservations, Ojhaji advised that the journey was indeed legitimate, and he himself accompanied the royal entourage to London. On their return, however, strong criticism arose. Rumors spread of banishing Ojhaji from the community, and the king too faced opposition. In response, Ojhaji composed this volume, demonstrating with scriptural authority that foreign travel was not prohibited but rather sanctioned within the framework of the shastras. Prof. Radhavallabh Tripathi With nearly four decades of continuous service as a regular teacher at the Universities of Udaipur and Sagar, Prof. Radhavallabh Tripathi is among the senior-most Sanskrit scholars in the country. At Dr. Harisingh Gour University (formerly University of Sagar), he holds the distinction of being the senior-most professor. Prof. Tripathi is widely recognized for his original and pioneering contributions to the study of Nāṭyaśāstra and Sāhityashāstra. His prolific scholarship includes 109 books, 183 research papers and critical essays, along with translations of more than 30 Sanskrit plays and several classical works into Hindi. He has twice served as Dean, Faculty of Arts, at Dr. Harisingh Gour University. As the senior-most professor of the institution, he also officiated as Vice-Chancellor for about six months, and on two other occasions was appointed Acting Vice-Chancellor by the Hon’ble Governor of Madhya Pradesh. In recognition of his literary and academic contributions, Prof. Tripathi has been honored with over 20 national and international awards, including the Sahitya Akademi Award for Sanskrit poetry and the Shankar Puraskar of the K.K. Birla Trust for his monumental Nāṭyaśāstra-Viśvakosha (in four volumes). He has headed the Department of Sanskrit at Dr. H.S. Gour University from July 1980 to the present, except for a three-year period (2002–2005) when he served as Visiting Professor at Silpakorn University, Bangkok, under an ICCR deputation.

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National Seminar on Kadambini-Ulkadhikara Part VII

A National Symposium organised by Shri Shankar Shikshayatan Vedic Research Institute was held online on Thursday, July 31, 2025, from 5:00 to 7:00 PM. The symposium was based on various topics from Kadambini, a text composed by Pandit Madhusudan Ojha, specifically from its section dealing with celestial phenomena. Dr. Yagyadatt, Assistant Professor, Department of Astrology, Central Sanskrit University, Ved Vyasa Campus, said in his address that five types of fire originate in the sky. Their names are — Vajra, Vidyut, Maholka, Dhishnya, and Tara. In meteorology, all five are referred to as Ulkas (meteors). Dr. Suresh Sharma, Assistant Professor, Department of Astrology, Central Sanskrit University, Shri Raghunath Kirti Campus, delivered his lecture on the Prakīrṇa Adhyāya (Miscellaneous Chapter) of Kadambini. He explained that the content of this chapter is divided into six topics: Rahu, Ketu, Tara, Digdaha (scorching of directions), Dust Rain (Pāṃsu), and Earthquake. The first topic of this chapter is Rahu. Rahu has neither its own light nor reflects another’s light. It does not shine. Even though it exists and moves in the sky, its movement leaves no visible trace. Dr. Ganesh Krishna Bhatt, Assistant Professor, Department of Astrology, Central Sanskrit University, Guruvayur Campus, said that Rahu is also called Svarbhanu. If an eclipse occurs in the month of Mārgaśīrṣa, there will be no rain in the regions called Puṇḍraka, Kashmir, Kaushal, and the western part of India, but the rest of the country will have rain, prosperity, and abundance. If an eclipse occurs in Pausha month, it will harm the regions called Sindhu, Videha, and Kukur, and the rest of the country will suffer from low rainfall and famine. Dr. Ratish Kumar Jha, Assistant Professor, Department of Astrology, Dr. Jagannath Mishra Sanskrit College, Madhubani, Bihar, said that the dark, lightless half of celestial bodies such as the Earth, Moon, and Mercury is called Svarbhanu. The triangular shadow arising from this dark part is called Svarbhanu Rahu. Since the sun remains in their “Svar” (region), they are called Svarbhanu. Prof. Santosh Kumar Shukla, Professor, School of Sanskrit and Indic Studies, Jawaharlal Nehru University, New Delhi, said that today’s topic is highly practical and can only be understood through observation. Pandit Ojha has mentioned many synonyms for Vajra. Analyzing these names is important because their meanings reveal the basis of their naming. The synonyms include: Hrādini, Vajra, Āpotra, Bhidira, Bhidura, Bhidu, Jambhāri, Jāmbavi, Dambha, Dambholi, Aśani, Pavi, Shatadhara, Shatara, Gau, Meghabhūti, Girijvara, Shatakoṭi, Svaru, Shamba, Kuliśa, Girikantaka. Dr. Ashish Mishra, Guest Lecturer, Department of Vedas, Central Sanskrit University, Eklavya Campus, Tripura, recited the Vedic invocation with intonation. The program was conducted by Dr. Lakshmi Kant Vimal, Research Officer, Shri Shankar Shikshayatan Vedic Research Institute. The symposium was attended by professors, research scholars, and Sanskrit enthusiasts from universities and colleges across various states.

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राष्ट्रीय संगोष्ठी कादम्बिनी : उल्काधिकार विमर्श (शृंखला-७)

प्रतिवेदन श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान द्वारा दिनांक ३१ जुलाई, बृहस्पतिवार २०२५ को सायंकाल ५-७ बजेतक अन्तर्जालीय माध्यम से राष्ट्रीय संगोष्ठी का समायोजन किया गया। पण्डित मधुसूदन ओझा प्रणीतकादम्बिनी नामक ग्रन्थ के उल्काधिकार के विविध विषयों को आधार बना कर यह राष्ट्रीय संगोष्ठी समायोजितकी गई थी। डॉ. यज्ञदत्त, सहायक आचार्य, ज्योतिष विभाग, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, वेद व्यास परिसर, ने अपनेवक्तव्य में कहा कि अन्तरिक्ष में पाँच प्रकार की अग्नियाँ उत्पन्न होती हैं। इनके नाम हैं- वज्र, विद्युत्, महोल्का,धिष्ण्या और तारा । वृष्टिविद्या में इन पाँचों को उल्का नाम से प्रतिपादन किया जाता है। वज्रं विद्युन्महोल्का च धिष्ण्या तारेति पञ्चधा ।उल्केति संज्ञया ख्याता अन्तरिक्षोद्भवाग्नयः॥ कादम्बिनी पृष्ठ १६८ कारिका २०१ इन पाँच में विद्युत् नामवाली और तारा नामवाली उल्का छः दिन तक लगातार दिखाई दे, महोल्का पन्द्रह दिनतक दिखाई दे, वज्र और धिष्ण्या पैंतालिस दिन तक लगातार दिखाई दे तो उस वर्ष फसल की उपज अच्छीहोगी। विद्युत्तारादिनैः षड्भिरुल्का पक्षेण वीक्षिता ।वज्रं धिष्ण्या त्रिभिः पक्षैः फलपाकाय कल्पते ॥ वही, पृष्ठ १६८, कारिका २०२ डॉ. सुरेश शर्मा, सहायक आचार्य, ज्योतिष विभाग, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, श्रीरघुनाथकीर्ति परिसर नेकादम्बिनी ग्रन्थ के प्रकीर्णाध्याय पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि प्रकीर्णअध्याय के विषयवस्तु को छः भागों में विभक्त किया गया है। ये हैं- राहु, केतु, तारा, दिग्दाह, धूल की वर्षा(पांसु) और भूकम्प। राहवः केतवस्तारा दिग्दाहः पांसुवर्षणम् ।भूकम्पश्चेति षड् भावा उक्ता वैकारिकाह्वयाः ।। वही, पृष्ठ १७१, कारिका २१६ प्रकीर्ण अध्याय का पहला विषय राहु है। राहु में अपनी ज्योति और दूसरे की ज्योति नहीं रहती है। राहु प्रकाशनहीं करता है। ये आकाश में रहते भी हैं और चलते भी हैं, इसका बोध नहीं होता है ।अर्थात् राहु गति संबन्धीजो भी क्रिया को करता है, उसका कोई चिह्न नहीं बनता है। राहवः स्व-पर-ज्योतीराहित्यादप्रकाशिनः ।अपि सन्तोऽपि गच्छन्तो द्युमार्गेषु न भान्ति ये ॥ वही, पृष्ठ १७१, कारिका २१७ डॉ. गणेश कृष्ण भट्ट, सहायक आचार्य, ज्योतिष विभाग, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, गुरुवायूर परिसर, नेअपने वक्तव्य में कहा कि प्रकीर्णाध्याय में राहु प्रथम विषय है। इसी राहु को स्वर्भानुराहु कहा जाता है। मार्गशीर्षमास में ग्रहण होने पर पुण्ड्रक नामक देश, काश्मीर नामक देश, कौशल नामक देश तथा भारत के पश्चिम भाग मेंवर्षा नहीं होगी और देश के दूसरे भाग में वृष्टि, क्षेम और सुभिक्ष होता है। मार्गे तु ग्रहणं हन्यात् मगधान् काशिकोशलान् ।तथाऽपरान्तकान् शेषे वृष्टि-क्षेम-सुभिक्षकृत्॥ वही, पृष्ठ १७३, कारिका २४५ पौष मास में ग्रहण होने से सिन्धु नामक देश, विदेह नामक देश, कुकुर नामक देश की हानि करता है और देश केदूसरे भाग में अल्पवृष्टि और दुर्भिक्ष होता है। पौषे दृष्टं हन्ति सिन्धून् विदेहान् कुकुरांस्तमः।देशान्तरे तु कुरुते दुर्भिक्षं स्वल्प-वर्षणम्॥ वही, पृष्ठ १७३., कारिका २४६ डॉ. रतीश कुमार झा, सहायक आचार्य, ज्योतिष विभाग, डॉ. जगन्नाथ मिश्र संस्कृत महाविद्यालय मधुवनी,बिहार ने अपने वक्तव्य में कहा कि पृथ्वी, चन्द्रमा और बुध आदि परज्योति पिण्डों के प्रकाशरहित तमोमय आधेभाग को स्वर्भानु कहते हैं। ये परज्योतिषः पिण्डाः पृथ्वी-चन्द्र-बुधादयः।तेषां प्रकाशितादर्द्धादर्द्धमन्यत् तमोमयम् ॥ वही, पृष्ठ १७२, कारिका २३२ तमोमय भाग से उत्पन्न तीन कोण वाली छाया को स्वर्भानु नाम के राहु कहते हैं। इनके स्वर्भाग में भानु रहता है,इससे इनको स्वर्भानु कहते हैं। तज्जाश्छायामयास्त्र्यस्त्रा उक्ताः स्वर्भानुराहवः।स्वर्भागे भानुरस्त्येषा तस्मात् स्वर्भानवः स्मृताः॥ वही, पृष्ठ १७२., कारिका २३३ प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल, आचार्य, संस्कृत एवं प्राच्य विद्या अध्ययन संस्थान, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय,नई दिल्ली ने कहा कि आज का विषय अत्यन्त ही प्रायोगिक है। प्रयोग के आधार पर ही इस विषय को समझाजा सकता है। पण्डित ओझा जी ने वज्र के अनेक पर्याय शब्दों का उल्लेख किया है। इन शब्दों का विश्लेषण अर्थकी दृष्टि से करना अत्यन्त आवश्यक है क्योंकि इसका नाम अर्थ के आधार पर ही बना होगा। ह्रादिनी, वज्र,आपोत्र, भिदिर, भिदुर, भिदु, जम्भारी, जाम्बवि, दम्भ, दम्भोलि, अशनि, पवि, शतधार, शतार, गौ, मेघ-भूति, गिरिज्वर, शतकोटि, स्वरु, शम्ब, कुलिश, गिरिकण्टक इतने वज्र के नाम हैं । ह्रादिनी वज्रमापोत्रं भिदिरं भिदुरं भिदुः।जम्भारिर्जाम्बविर्दम्भो दम्भोलिरशनिः पविः॥शतधारं शतारङ्गौ मेघ-भूतिर्गिरि-ज्वरः।शतकोटिः स्वरुः शम्बः कुलिशं गिरिकण्टकः॥ वही, पृष्ठ १६८., कारिका २०५-२०६ डॉ. आशीष मिश्र, अतिथि अध्यापक, वेद विभग, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, एकलव्य परिसर, त्रिपुरा नेसस्वर वैदिक मङ्गलाचरण का पाठ किया। कार्यक्रम का सञ्चालन श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान केशोध अधिकारी डॉ. लक्ष्मी कान्त विमल ने किया। इस कार्यक्रम में अनेक प्रान्तों के विश्वविद्याल औरमहाविद्याल के आचार्य, शोधछात्र, संस्कृत विद्या मे रुचि रखने वाले विद्वानों

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